भोपाल न्यूज़ (Bhopal News)

सरकार की नहीं सुनते प्रायवेट अस्पताल

  • स्वास्थ्य विभाग करता है जांच रेट का बोर्ड लगाने के निर्देश देेने की खानापूर्ति

भोपाल। प्रदेश में निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग सिर्फ खानापूर्ति करता है। विभाग में जो भी मंत्री आता है, वह सिर्फ बैठकों में निर्देश जारी करके खानापूर्ति करता है। यही वजह है कि निजी अस्तपाल सरकार के निर्देशों का कढ़ाई से पालन नहीं करते हैं और उपचार के नाम पर मरीजों के साथ लूट होती रहती है। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी ने अफसरों की बैठक में निर्देश दिए हैं कि निजी अस्पताल पचार की उपलब्ध सुविधाओं, विभिन्न प्रकार की जाँच और दवाइयों से संबंधित जानकारी के साइन-बोर्ड लगाएं। पूर्व में भी मंत्री यही निर्देश जारी करते रहे हैं। इसके बावजूद भी अस्पताल सरकार के निर्देश का पालन नहीं करते हैं। खास बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग किसी भी अस्पताल पर कोई कार्रवाई नहीं करता है। इतना ही नहीं निजी अस्तपालों को अनुमति देने की शर्त में भी यही प्रावधान है कि अस्तपालों परिसर में मुख्य प्रवेश कक्ष में उपचान एवं जांच सुविधाओं की दरों के बोर्ड लगाना अनिवार्य होगा। सीएमएचओ को नियमित रूप से निजी अस्पतालों की जांच करना होता है, लेकिन यह सिर्फ खानाूपर्ति तक सीमित है।



स्वास्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी ने एक बार फिर अफसरों से कहा है कि उपचार, जाँच और दवाइयों की उपलब्धता के साथ आम नागरिकों को इनकी जानकारी होना भी जरूरी है। डॉ. चौधरी ने कहा कि उप स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, सिविल अस्पताल और जिला अस्पताल में उपचार, विभिन्न प्रकार की जाँच और दवाइयों की उपलब्धता होने के बाद भी कई बार आम आदमी निजी अस्पतालों में जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण आम नागरिकों को यह जानकारी नहीं होना है कि उनके समीप के सरकारी अस्पताल में इलाज की वे सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इसके लिये जरूरी है कि उन्हें जानकारी दी जाये।

बच्चों के हीमोग्लोबिन का रिकॉर्ड रखा जायेगा
एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम के अंतर्गत सभी शासकीय और शासकीय अनुदान प्राप्त स्कूलों और आँगनवाड़ी केन्द्रों के माध्यम से बच्चों के हीमोग्लोबिन का रिकॉर्ड रखा जायेगा। इसके लिये सभी बच्चों के खून की जाँच की जायेगी। स्कूल में ही हीमोग्लोबिनो मीटर से खून की जाँच कर हीमोग्लोबिन का स्तर पता किया जायेगा। इसके लिये आरबीएस के दल द्वारा शालाओं में वर्ष में एक बार और आँगनवाड़ी केन्द्रों में वर्ष में दो बार एनीमिया की जाँच की जायेगी। खून की कमी वाले चिन्हित बच्चों और किशोर-किशोरियों को उपचार के लिये औषधियाँ भी दी जायेंगी। गंभीर खून की कमी वाले (एनिमिक) बच्चों को स्वास्थ्य संस्थाओं पर रेफर किया जायेगा, जहाँ पर चिकित्सकों द्वारा उनकी पुन: जाँच कर यथोचित उपचार सुनिश्चित किया जायेगा।

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