
जबलपुर। शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर शुरू किए गए कई बड़े प्रोजेक्ट अब अपनी उपयोगिता और संचालन को लेकर सवालों के घेरे में हैं। आरएफआईडी, एनएमटी, ओपन एयर थियेटर, हैक्सी साइकिल, कन्वेंशन सेंटर, सांस्कृतिक थियेटर और अन्य योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन इनमें से कई परियोजनाएं अपेक्षित उपयोगिता और आर्थिक लाभ हासिल नहीं कर पाईं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन परियोजनाओं पर जनता के टैक्स से मिली राशि खर्च की गई, उनका वर्तमान संचालन, रखरखाव और उपयोगिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? कई प्रोजेक्टों में रखरखाव की जरूरत सामने आ रही है, लेकिन संबंधित व्यवस्थाओं को लेकर सवाल बने हुए हैं।
मेंटेनेंस के अभाव में दम तोड़ रहे प्रोजेक्ट?
स्मार्ट सिटी के अंतर्गत तैयार की गई परिसंपत्तियों के रखरखाव को लेकर भी स्थिति स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। किसी भी सार्वजनिक परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसका लंबे समय तक संचालन और रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में सवाल है कि करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई इन परिसंपत्तियों के रखरखाव के लिए क्या ठोस व्यवस्था बनाई गई है? यदि व्यवस्था बनाई गई है तो उसकी निगरानी कौन कर रहा है और अब तक कितना खर्च किया गया है?
जांच हो तो सामने आ सकता है पूरा सच
स्मार्ट सिटी के विभिन्न प्रोजेक्टों की लागत, टेंडर प्रक्रिया, निर्माण गुणवत्ता, उपयोगिता, संचालन, राजस्व और मेंटेनेंस पर यदि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तकनीकी ऑडिट कराया जाए तो परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। किस प्रोजेक्ट पर कितना खर्च हुआ, उसकी वर्तमान स्थिति क्या है, उससे कितनी आय हुई, उसका रखरखाव किस एजेंसी के जिम्मे है और निर्धारित लक्ष्यों में से कितने पूरे हुए, इन सभी बिंदुओं का सार्वजनिक ऑडिट शहर के सामने तस्वीर साफ कर सकता है। अब सवाल सिर्फ स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्टों का नहीं, बल्कि जनता के पैसे से तैयार की गई संपत्तियों के भविष्य का है। करोड़ों की परियोजनाओं का निर्माण हो जाने के बाद यदि उनका उपयोग, रखरखाव और आर्थिक लाभ सुनिश्चित नहीं किया गया, तो ‘स्मार्टÓ शहर का सपना अधूरा ही रह जाएगा।
अब कन्सल्टेंसी की भूमिका पर भी सवाल
सबसे अहम सवाल अब स्मार्ट सिटी से जुड़े अधिकारियों और तकनीकी टीम की भूमिका को लेकर उठ रहा है। यदि स्मार्ट सिटी के पुराने प्रोजेक्टों की उपयोगिता, संचालन और रखरखाव को लेकर सवाल हैं, तो उन्हीं अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों को शहर के नए विकास कार्यों में सलाहकार या कन्सल्टेंसी की भूमिका दिए जाने के फैसले की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शहरवासियों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन परियोजनाओं का प्रदर्शन अपेक्षित स्तर पर नहीं रहा, उनसे जुड़े अनुभवों का स्वतंत्र मूल्यांकन किए बिना उन्हें भविष्य की परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका क्यों दी जा रही है?
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