
काठमांडू। नेपाल (Nepal) के काठमांडू (Kathmandu) स्थित त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Tribhuvan International Airport) से उड़ान भरने वाले भारतीय विमानों (Indian aircraft) की सुरक्षा व्यवस्था पिछले 26 सालों से भारत खुद संभाव रहा है। नेपाल में इसको लेकर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल दिसंबर 1999 में कंधार हाईजैक (फ्लाइट IC814) के बाद शुरू हुई एक ‘अस्थायी’ व्यवस्था आज स्थायी रूप ले चुकी है जिसके तहत भारतीय सुरक्षाकर्मी नेपाल की धरती पर यात्रियों और उनके सामान की अतिरिक्त तलाशी लेते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया से नेपाली एजेंसियों को दूर रखा जाता है और नेपाल के किसी भी मंत्रालय यानि गृह या नागरिक उड्डयन के पास इस विदेशी सुरक्षा तैनाती को वैध ठहराने वाला कोई भी दस्तावेज नहीं है। यह स्थिति अब नेपाल की संप्रभुता और दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों को लेकर एक नई बहस छेड़ रही है। काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से भारतीय रजिस्टर्ड विमान में उड़ान भरने वाले किसी भी यात्री को विमान में चढ़ने से ठीक पहले एक अतिरिक्त सुरक्षा जांच से गुज़रना पड़ता है।
काठमांडू एयरपोर्ट पर 26 साल से क्यों खुद जांच करता है भारत?
काठमांडू पोस्ट के मुताबिक एयरपोर्ट एप्रन पर एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बने स्क्रीनिंग पॉइंट पर जहां भारतीय सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं वहां यात्रियों की तलाशी ली जाती है और उनके सामान की अच्छी तरह से हाथ से जांच की जाती है। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है और न ही यह कोई नई बात है। लेकिन पच्चीस साल से ज्यादा समय बीतने के बाद यह अब विमान में चढ़ने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा बन गया है।
पोस्ट को नेपाल के सिविल एविएशन अथॉरिटी के एक अधिकारी ने बताया है कि एयर इंडिया और इंडिगो दोनों ही त्रिभुवन में तीन शिफ्ट में भारतीय स्टाफ तैनात करते हैं। एक उड़ान के लिए काम करने वाले 12 से 15 लोगों में से छह से आठ भारतीय कर्मचारी एप्रन पर तैनात होते हैं। वे सुरक्षाकर्मियों वाले भारी जूते पहनते हैं। यात्रियों को एक-एक करके चारों तरफ से घिरी हुई ट्रॉली में भेजा जाता है जहां भारतीय स्टाफ उनके शरीर और उनके हैंड बैगेज की तलाशी लेते हैं।
उन्होंने कहा कि नेपाली स्टाफ मदद तो करते हैं लेकिन उन्हें असल तलाशी प्रक्रिया से दूर रखा जाता है। अधिकारी ने कहा ‘भारत जाने वाली उड़ानों के लिए एप्रन एरिया में मुख्य ड्यूटी में नेपाली स्टाफ को कोई भूमिका नहीं दी जाती है।’ इस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर स्टाफिंग और तलाशी के बारे में जानकारी दी।
नेपाली अधिकारियों को सुरक्षा जांच से क्यों रखा जाता है दूर?
उन्होंने कहा कि कोई भी नेपाली एजेंसी ऐसा कोई दस्तावेज नहीं दिखा सकती जिससे मूल रूप से इसकी मंजूरी मिली हो। पोस्ट ने बताया है कि नेपाली मीडिया ऑउटलेट ‘कांतिपुर’ ने संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय, नेपाल के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण और गृह मंत्रालय के अधिकारियों से कई बार पूछा कि क्या वे संबंधित रिकॉर्ड ढूंढ सकते हैं। हर बार उन्होंने इस सवाल के लिए किसी दूसरी एजेंसी का जिक्र किया। कंधार विमान अपहरण मामले के बाद ये प्रक्रिया शुरू हुई थी लेकिन नेपाल ने इसको लेकर कभी लिखित सहमति नहीं दी।
पोस्ट ने लिखा है कि नेपाल की संप्रभुता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं लेकिन किसी भी सरकार ने इस व्यवस्था की समीक्षा करने की कोशिश नहीं की। पोस्ट का कहना है कि भारत ने बार-बार और ज्यादा सुविधाओं की मांग की है जिसमें काठमांडू से जाने वाली अपनी उड़ानों में स्काई मार्शल तैनात करने की अनुमति भी शामिल है। नेपाली अधिकारियों ने हर बार इस मांग को ठुकरा दिया है या चुपचाप टाल दिया है।
कंधार कांड के बाद नेपाल ने दी थी भारत को यह इजाजत
पोस्ट के मुताबिक कई अधिकारियों, राजनयिकों और विदेश मंत्रियों ने ‘कांतिपुर’ को बताया कि नेपाल ने इस व्यवस्था को हटाने के लिए कभी कोई औपचारिक प्रयास या राजनयिक पत्राचार नहीं किया। पोस्ट से बात करते हुए भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि भारत ने नेपाल के विदेश मंत्री स्तर की यात्रा के दौरान यह प्रस्ताव रखा था लेकिन इसे ठुकरा दिया गया था। उनके अनुसार इसके बजाय नेपाल ने भारतीय अधिकारियों को अलग से सुरक्षा स्क्रीनिंग करने की इजाजत देने के लिए मौखिक सहमति दी थी। वे कहते हैं कि उस सहमति में असल में क्या शामिल था इस पर और बारीकी से विचार करने की ज़रूरत है।
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