
नई दिल्ली। कभी अचानक धरने पर बैठना, कभी पुलिस थाने पहुंच जाना और कभी तय कार्यक्रम से अलग रास्ता अपनाकर अचानक किसी जगह पहुंच जाना राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की हालिया राजनीति (Politics) में ऐसे औचक कदम लगातार नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में विरोध प्रदर्शन (Protest) के दौरान उनकी यह शैली इतनी प्रमुख हुई है कि इसे कांग्रेस की बदली हुई ‘सरप्राइज पॉलिटिक्स’ के तौर पर देखा जा रहा है।
हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों में भी राहुल गांधी का यही अंदाज दिखाई दिया। 6 अक्टूबर को तय मार्च को पुलिस ने रोका तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने आकाशवाणी भवन के पास धरना शुरू कर दिया। करीब आठ घंटे चले इस धरने के बाद पुलिस ने राहुल और अन्य नेताओं को हिरासत में लिया। अगले दिन भी राहुल गांधी ने जंतर-मंतर की ओर मार्च की कोशिश की और पुलिस ने उन्हें फिर हिरासत में लिया।
औचक एक्शन पर ज्यादा जोर
राहुल गांधी की हालिया रणनीति में एक बात लगातार दिखाई देती है—अचानक कदम उठाना और राजनीतिक संदेश को सीधे जमीन पर उतारना। बड़े मंच या लंबी तैयारियों वाले कार्यक्रमों के बजाय कभी छोटा समूह उनके साथ नजर आता है तो कभी वे खुद ही विरोध की अगली पंक्ति में पहुंच जाते हैं।
हालिया प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस ने जिस रास्ते पर बैरिकेड लगाए थे, वहां राहुल गांधी ने अलग अंदाज में आगे बढ़ने की कोशिश की। एक मौके पर वे बैरिकेड पर चढ़े और हाथ में तिरंगा लेकर नजर आए। इसके बाद चुनाव आयोग के पास धरना देने का फैसला हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक, यह घटनाक्रम पुलिस की पहले से तय रणनीति से अलग था।
राजनीतिक विरोध की यह शैली मीडिया और सोशल मीडिया पर भी ज्यादा दृश्यता पैदा करती है। राहुल गांधी के हालिया प्रदर्शनों को लेकर रिपोर्टों में कांग्रेस नेतृत्व की ओर से पारंपरिक विरोध प्रदर्शनों से अलग, ज्यादा प्रभावी और ध्यान खींचने वाले तरीकों पर जोर देने की बात सामने आई है।
यह तरीका नया नहीं, भट्टा-पारसौल से दिखी थी झलक
हालांकि, अचानक मौके पर पहुंचकर राजनीतिक संदेश देने का तरीका राहुल गांधी के लिए नया नहीं है। इसकी एक चर्चित मिसाल 2011 के भट्टा-पारसौल किसान आंदोलन में देखने को मिली थी।
उस समय राहुल गांधी तड़के मोटरसाइकिल पर सवार होकर ग्रेटर नोएडा के भट्टा-पारसौल गांव पहुंच गए थे। पुलिस की कड़ी मौजूदगी के बावजूद उन्होंने किसानों से मुलाकात की और उनके साथ धरने पर बैठे। बाद में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। उस समय भी उनका यह कदम अचानक और सीधे आंदोलन के केंद्र में पहुंचने वाला था।
फर्क यह है कि तब ऐसी घटनाएं कभी-कभार दिखाई देती थीं, जबकि अब पिछले कुछ समय में इस तरह के कदम उनकी विरोध की राजनीति का ज्यादा नियमित हिस्सा नजर आ रहे हैं।
मार्शल आर्ट्स से जोड़कर देखते हैं राहुल
राहुल गांधी पहले भी अपनी राजनीतिक रणनीति को मार्शल आर्ट्स से जोड़कर बात कर चुके हैं। वे मार्शल आर्ट्स की विभिन्न विधाओं का अभ्यास करते रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी वे दिनभर पैदल चलने के बाद यात्रियों के साथ मार्शल आर्ट्स के अभ्यास में हिस्सा लेते थे।
उनकी इस शैली में एक विचार यह भी दिखाई देता है कि सीधे टकराव के बजाय मौके के हिसाब से प्रतिक्रिया दी जाए। हालांकि, किसी राजनीतिक रणनीति को सीधे उनके मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षण का परिणाम मानना एक विश्लेषण ही होगा, प्रमाणित तथ्य नहीं।
धरना पॉलिटिक्स में फिटनेस भी अहम
लगातार सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करना शारीरिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। राहुल गांधी खुद कई मौकों पर फिटनेस को अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा बता चुके हैं। एक वीडियो में उन्होंने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद नियमित कसरत करने की बात कही थी।
अब उनकी राजनीतिक गतिविधियों में इसका एक व्यावहारिक पहलू भी दिखाई देता है। लंबे मार्च, घंटों धरना और पुलिस के साथ आमने-सामने की स्थिति के दौरान उनका लगातार सक्रिय रहना कांग्रेस की जमीन पर उतरने वाली राजनीति का हिस्सा बन गया है।
‘अड़ियल तेवर’ या सोची-समझी रणनीति?
राहुल गांधी के हालिया विरोध प्रदर्शनों में एक और पैटर्न दिखाई देता है—विरोध की जगह छोड़ने के बजाय वहीं डटे रहना। चाहे प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ने का मामला हो या संसद मार्ग पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराने की मांग, कई मौकों पर उन्होंने कार्रवाई पूरी होने तक वहां बने रहने का रुख अपनाया है।
हाल के चुनाव आयोग विरोधी प्रदर्शन में भी राहुल गांधी ने आयोग के प्रतिनिधिमंडल से मिलने की मांग को लेकर धरना जारी रखा। विपक्ष का कहना था कि वह चुनाव आयोग से सीधे बात करना चाहता है, जबकि आयोग की ओर से कहा गया कि तय प्रोटोकॉल के तहत मुलाकात की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इस टकराव ने विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक रूप से और ज्यादा सुर्खियों में ला दिया।
राहुल गांधी के करीबी नेताओं की दलील रही है कि वे राजनीतिक नफा-नुकसान का हिसाब लगाकर हर कदम नहीं उठाते। उनके मुताबिक राहुल जो सही समझते हैं, उस पर आगे बढ़ते हैं, भले ही उसका राजनीतिक नुकसान क्यों न उठाना पड़े। यह उनके समर्थकों का आकलन है, जिसे राजनीतिक विश्लेषण के तौर पर देखा जाना चाहिए।
‘ब्रांड मोदी’ के सामने अलग पहचान बनाने की कोशिश?
राहुल गांधी के सामने राजनीतिक चुनौती सिर्फ सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने की नहीं, बल्कि अपनी अलग राजनीतिक पहचान मजबूत करने की भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबे समय से बनी स्थापित राजनीतिक छवि के मुकाबले राहुल गांधी की हालिया गतिविधियों में एक अलग तरह की पहचान गढ़ने की कोशिश दिखाई देती है।
एक तरफ मोदी की राजनीति को उनके समर्थक स्थिर नेतृत्व, संगठन और सरकार के केंद्रित संचालन से जोड़ते हैं, वहीं राहुल गांधी की मौजूदा शैली में सड़क पर उतरना, अचानक विरोध करना, बैरिकेड के सामने खड़ा होना और सीधे टकराव की स्थिति में जाना ज्यादा दिखाई देता है।
इसी वजह से उनकी राजनीति को ‘एंटी-मोदी ब्रांड’ के रूप में पेश किए जाने की चर्चा होती है। हालांकि, यह किसी स्थापित तथ्य के बजाय राजनीतिक विश्लेषण और धारणा का विषय है।
आने वाले समय में राहुल गांधी की यह सरप्राइज और सड़क-केंद्रित राजनीति कांग्रेस को कितना राजनीतिक लाभ देती है, यह चुनावी नतीजों और जनता की प्रतिक्रिया से ही तय होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि कांग्रेस के विरोध प्रदर्शनों में राहुल गांधी खुद को केवल भाषण देने वाले नेता के बजाय आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रखने की कोशिश कर रहे हैं।
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