यह कांग्रेस है… यहां अपने अपनों से लड़ते हैं… इसीलिए नेता जनता की परवाह करते रहते हैं…

यह कांग्रेस का अनुशासन है, जहां स्वयं का स्वयं पर शासन है… जहां हर व्यक्ति शासक है और हर व्यक्ति नेतृत्व है… जहां जुबान दिल से चलती है… जहां जुबान पर लगाम नहीं रहती है… जो दिल में आया कह दिया… मंच मिला तो भी परहेज नहीं किया… जंग का रंग सार्वजनिक भी हो जाता है… शिकवा-गिला जुबान से ही मिट जाता है… हर नेता का अपना वजूद रहता है… सत्ता हो या संगठन सामूहिकता से चलता है… यहां दिल्ली नेताओं पर भारी नहीं पड़ती है… और सबसे बड़ी बात पिता की विरासत बेटों को मिलती है… इसलिए उनकी राजनीतिक परवरिश संदेह में नहीं रहती है… दो दिन पहले झल्लाए कमलनाथ ने गुस्सा दिग्गी राजा पर निकाला… मौका मिलते ही दिग्गी राजा ने भी खुले मंच पर जवाब दे डाला… कमलनाथ ने अपने नेता के गुस्से को परखा और पढ़ा तो अधिकारों के जुमले बनाए और संवेदनाओं के मरहम लगाए… बात यहीं खत्म हो गई… दिग्गी ने भी नाथ का मान रखा… टिकट बदलने पर सहमति बनाई और कपड़े फटने-फाडऩे के बजाय रिश्तों की कमीज सिलवाई… यह कांग्रेस का चरित्र रहा है… यहां पार्टी में भी लोकतंत्र रहता है… यहां जिसका जितना वजूद उतना उसे महत्व मिलता है… यहां अपने अपनों से लड़ते हैं… इसीलिए जनता से जुड़े लोग जनता की परवाह करते रहते हैं… यहां तानाशाही नहीं चलती… यहां मुख्यमंत्री ही मुखिया नहीं होता, बल्कि जो मुखिया नहीं होता वह भी मुख्यमंत्री जैसा ही रहता है… यहां कमलनाथ कुर्सी पर बैठते हैं, मगर दिग्गी भी महत्व रखते हैं… यहां गहलोत मुख्यमंत्री रहते हैं तो पायलट उनके खिलाफ मोर्चा निकालकर जनता के गुस्से को शांत करने की हिम्मत रखते हैं… यहां अधिकारी हुक्म नहीं चलाते हैं, बल्कि मुख्यमंत्री विधायकों से लेकर पार्षदों तक का हुक्म मानते हैं… यहां सामूहिकता नजर आती है, लेकिन वैचारिकता कायम रहती है… यहां हर नेता अपना अस्तित्व बढ़ाने के लिए आजाद रहता है… और दिल्ली इसे स्वीकार करती है… इंदिराजी के समय से लेकर राजीव गांधी के समय तक देश के हर राज्य में दो से तीन नेताओं का वजूद रहा…मध्यप्रदेश में अर्जुनसिंह के साथ सिंधिया से लेकर श्यामाचरण, विद्याचरण शुक्ल जैसे नेता रहे तो दिल्ली ने वोराजी को भी स्थापित कर दिया … दिग्विजयसिंह बने तो सिंधिया के साथ सुभाष यादव और कमलनाथ को खड़ा कर दिया … कांग्रेस में नेतृत्व का अभाव कभी नहीं रहा… जबकि भाजपा में आज शिवराज का कोई विकल्प नजर नहीं आता… उमा भारती के बाद गौर को आजमाया गया और शिवराज को लाया गया… उनकी राह के हर रोड़े को हटाया गया… तोमर, प्रहलाद पटेल दिल्ली भेज दिए गए…विजयवर्गीय संगठन में ले लिए गए और चुनौतियों से दूर शिवराज चेतावनी बन गए…उन्होंने जैसा चाहा प्रदेश चलाया, कोई चूं नहीं कर पाया… विधायक जी-हुजूरी करते रहे… नेता सर झुकाकर चलते रहे… अब आज उन्हें चेहरा नहीं बनाया जा रहा है… लेकिन चेहरा कौन होगा कहीं नजर नहीं आ रहा है… भाजपा यदि किनारे की जीत लाई तो कश्ती फिर शिवराज के ही हाथों में ही रहेगी… भाजपा को किसी दूसरे को नेता नहीं बनाने और अनुशासन की छड़ी नहीं घुमाने की यह सजा तो भुगतना ही होगी… देश में लोकतंत्र का नारा लगाने वाली पार्टियां पहले अपने दलों में लोकतंत्र लाएं… नेताओं की जुबान पर अनुशासन की लगाम न लगाएं… हर नेता को अपना अस्तित्व बताने, बढ़ाने और स्वीकार करने की दरियादिली दिखाएं तो सही अर्थों में जनता के द्वारा जनता के लिए जनता का राज स्थापित हो पाए…