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ये पॉलिटिक्स है प्यारे

June 29, 2026


शेडगे और जीतू यादव में फर्क तो है…
भाजपा ने पार्षद जीतू यादव को कमलेश कालरा प्रकरण में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। तब से यादव अपने क्षेत्र में तो सक्रिय हैं, लेकिन वे पार्टी के आयोजनों से दूर हैं। फिलहाल उन्हें क्लीनचिट मिल गई है। इसके बाद गेंद अब भाजपा नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा के पाले में है। वे उन्हें फिर से भाजपा में लेते हैं या नहीं। इस मामले में अभी दीनदयाल भवन में कोई सुगबुगाहट नहीं है। कहते हैं भाजपा अनुशासनात्मक पार्टी का दावा करती है, लेकिन दावों में दम नजर नहीं आता, तभी तो सीधे तौर पर दो-दो घटनाओं में चार नंबर खेमे के खास वीरेन्द शेडगे का नाम आने के बाद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। एक मामला पार्षद शानू शर्मा का भी है। इस मामले में भी भाजपा के वरिष्ठ नेता चुप्पी साधे बैठे हैं और एक तरह से शेडगे के पक्ष में कुछ बोलने से बच रहे हैं। मामला भी चार नंबर की अयोध्या का है। यहां हाथ डालना यानी बैठे-बिठाए मुसीबत मोल लेना।

दरी बिछाने वालों को नहीं मिली जगह
भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति में उन लोगों को निराशा हाथ लगी जो सालों से पार्टी के आयोजनों में दरी बिछाते आ रहे हैं। उन्हें लगा था कि पार्टी ने कोई बड़ा पद नहीं दिया, लेकिन कार्यसमिति में शामिल कर उनकी काबिलियत का आकलन तो करेगी, परंतु जैसे ही सूची जारी हुई, उनके अरमानों पर पानी फिर गया और ऐसे लोगों के साथ-साथ कांग्रेस से भाजपा में आए लोगों को ले लिया, जो गाहे-बगाहे चेहरा दिखाने पार्टी के आयोजनों में आते हैं। किसी ने भड़ास निकाली तो कोई अपने नेता से भिड़ पड़ा, लेकिन भोपाल वालों के आगे किसी की नहीं चली।



  • बहुत कठिन है डगर नेता प्रतिपक्ष की
    सोनिला मिमरोट को जीतू पटवारी नेता प्रतिपक्ष तो बना लाए, लेकिन सोनिला के लिए ये ताज कांटों भरा साबित हो सकता है। एक तो सोनिला के मामले में पार्षदों की राय नहीं ली गई। जो नेता प्रतिपक्ष बनना चाहते थे, वे नाराज हैं। कुछ महिला पार्षद भी हैं, जिनकी निगाह नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर थी, लेकिन सबकुछ उलटा हो गया। अंदर की खबर है कि सोनिला को पंक्चर करने की जुगाड़ कुछ नेता जमा रहे हैं, ताकि आगे से उनका पत्ता कट हो जाए। वैसे आज सोनिला पदभार ग्रहण करने जा रही है और देखना यह है कि कौन-कौन नेता खुले मन से निगम आता है।

    कृपा पंडित हैं वकील, लेकिन करते हैं नेतागीरी
    अभी तक आपने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कृपाशंकर शुक्ला को सफेद टोपी और खादी जैकेट में ही देखा है। उनके अंदर एक नेता की छवि है। कांग्रेसी तो उनको चाचा नेहरू भी कहते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोगों को यह पता है कि कृपा पंडित वकील भी हैं और उन्होंने सनद भी ले रखी है। यह खुलासा तब हुआ, जब उनके घर दिग्विजयसिंह पहुंचे थे। दरअसल दिग्विजयसिंह ने उनकी उंगली पर वह स्याही देखी जो मतदान के बाद लगाई जाती है तो पूछ लिया कि ये स्याही कैसे? पंडित बोले-बार चुनाव में मतदान करके आया हूं। दिग्गी ने पूछ लिया कि कभी तो आपको कोर्ट में नहीं देखा? इस पर पंडितजी ने कहा कि राजनीति चीज ही ऐसी है कि यहां व्यस्त होने के बाद दूसरे काम का ख्याल ही नहीं रहता। एक बार दर्जी को वकील के कोट का कपड़ा भी दे दिया था, लेकिन नाप देने तक का टाइम नहीं मिला।

    नेता प्रतिपक्ष ने पूरी कर दी औपचारिकता
    नई-नवेली नेता प्रतिपक्ष बनी सोनिला मिमरोट अपने पहले ही प्रयास में फैल हो गईं। शहर में पहली बारिश क्या हुई, वे पूरे शहर की चिंता करने की बजाय अपने वार्ड में घूमती नजर आई। बाकायदा उसके वीडियो भी बनाए गए और उसे अधिकारियों को भेजे गए। सोनिला अपने अंदाज में अधिकारियों से यह कहना नहीं चूंकि कि उनके वार्ड में किस तरह से पानी भरा रहा है और कोई ध्यान नहीं दे रहा है, जबकि होना तो यह चाहिए था कि वे पूरे शहर का दौरा कर लेतीं। खैर अभी तो शुरुआत है, अब देखना यह है कि कांग्रेस की ये नेत्री परफेक्ट नेता प्रतिपक्ष के रूप में फिट बैठती है या नहीं?

    वायरल हो गए भाजपाई
    विजयनगर थाने में हंगामा हुआ और महिला पुलिसकर्मी ने जो वीडियो बनाया, उसमें पहली बार तो दो नंबर के एक नेताजी और उनके साथी हाशिये पर चढ़ गए, लेकिन जब पड़ताल हुई तो मामला कुछ और ही निकला। नेताजी थाने में बैठे आवारा कुत्ते हटाने को लेकर बात करने गए थे, लेकिन पुलिसकर्मियों ने नेताजी को ही वायरल कर दिया। वे भी ठहरे खाटी नेता, उन्होंने उसी भाषा में पुलिस वालों को जवाब भी दे दिया।

    जब मिल बैठे दो यार… फिर किस्से हो हजार
    जब पुराने दो यार मिल बैठते हैं तो पुराने किस्से निकलना स्वाभाविक है। ऐसा ही कुछ हुआ दीनदयाल भवन की दूसरी मंजिल पर, जब आपातकाल के एक कार्यक्रम में पुराने संगठन मंत्री कप्तानसिंह सोलंकी आए थे और वे भाजपा कार्यालय पहुंचे थे। वहां सत्यनारायण सत्तन और नारायण केसरी जैसे खाटी भाजपाई मौजूद थे। चर्चा चल पड़ी तो पुराने किस्से भी आम होते गए। जब केसरी ने सत्तन को लंगोटिया कहा तो सत्तन ने भी अपनी स्टाइल में कह डाला कि हमारी उम्र में काफी फर्क है तो हम लंगोटिया कैसे हो गए? यहीं नहीं हास-परिहास का ये दौर कहानी-किस्सों में चलता रहा। यह देख सोलंकी भी मंद-मंद मुस्कुराते रहे।

    भाजपा के वरिष्ठ नेता कप्तानसिंह सोलंकी उस समय असहज हो गए, जब उनका भाषण आपातकाल पर चल रहा था और बीच में से वे युवा उठकर जाने लगे, जिन्हें राजनीति से कोई मतलब नहीं था। कप्तान ने यह समझने में देरी नहीं की और अपना भाषण जल्द ही खत्म कर दिया। अगर खींचते तो आधा हॉल खाली हो जाता। -संजीव मालवीय

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