मुंबई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के एक फैसले ने चीन की तेल कंपनियों (oil companies) को गहरी चोट पहुंचाई है, जिससे वे खरीदारों के अभाव में त्रस्त हो रही हैं। दरअसल, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा मॉस्को के प्रमुख तेल उत्पादकों तथा उनके कुछ खरीदारों को ब्लैकलिस्ट में डालने के बाद, चीनी रिफाइनरियां रूसी तेल के शिपमेंट से दूरी बना रही हैं। यही कारण है कि अब उन्हें ग्राहक नहीं मिल पा रहे हैं, और इसका मुख्य कारण अमेरिकी प्रतिबंधों को माना जा रहा है।
व्यापारियों के मुताबिक, सिनोपेक और पेट्रोचाइना जैसी सरकारी स्वामित्व वाली बड़ी कंपनियां पिछले महीने रोसनेफ्ट पीजेएससी तथा लुकोइल पीजेएससी पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते कुछ रूसी कार्गो रद्द करने के बाद इस कारोबार से पूरी तरह हट चुकी हैं। वहीं, छोटी निजी रिफाइनरियां, जिन्हें ‘टीपॉट्स’ कहा जाता है, भी डर के मारे ठप हो गई हैं, क्योंकि वे नहीं चाहती कि उन पर भी शांदोंग यूलोंग पेट्रोकेमिकल कंपनी जैसी सजा थोपी जाए, जिसे हाल ही में ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने ब्लैकलिस्ट में शामिल कर लिया है।
जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका और उसके सहयोगी अब रूसी उत्पादकों और उनके खरीदारों, दोनों पर प्रतिबंधों को और कड़ा कर रहे हैं, ताकि मॉस्को के तेल राजस्व को चोट पहुंचाकर यूक्रेन युद्ध को रोका जा सके। गौरतलब है कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। फिलहाल यह रूस से सबसे अधिक तेल आयात कर रहा है, जबकि दूसरे स्थान पर भारत है जो रूस से कच्चा तेल खरीदता है।

©2026 Agnibaan , All Rights Reserved