
छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में नक्सलियों (Naxalites) की दंडकारण्य विशेष क्षेत्रीय समिति के सदस्य व वरिष्ठ नक्सली कमांडर पापाराव (Senior Naxalite Commander Paparao) ने अपने 17 अन्य साथी माओवादियों के साथ मंगलवार को बीजापुर जिले में आत्मसमर्पण कर दिया। हथियार डालने वाले नक्सलियों में 11 पुरुष और 7 महिला नक्सली शामिल हैं। यह सरेंडर सुरक्षाबलों व राज्य सरकार के लिए एक अहम रणनीतिक सफलता है और 31 मार्च तक देश से माओवादी उग्रवाद के खात्मे की डेडलाइन के संबंध में सबसे अहम पड़ाव भी है।
एक रिपोर्ट के अनुसार पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ कुटरू थाने में आत्मसमर्पण किया। इसके बाद उन्हें वहां से बस के जरिए जगदलपुर ले जाया गया। अब इस बारे में राज्य सरकार बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए जानकारी दे सकती है।
पापा राव पर घोषित था 25 लाख रुपए का इनाम
दो दशकों से ज्यादा समय तक घने इंद्रावती-अबूझमाड़ जंगल इलाके में सक्रिय रहा पापा राव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से जुड़े आखिरी बड़े कमांडरों में से एक है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार पापा राव लगभग 25 वर्षों से जंगलों में सक्रिय था और इस दौरान कई बार सुरक्षा बलों के साथ उसकी मुठभेड़ भी हुई, लेकिन हर बार वह बच निकलता था। राज्य सरकार ने उस पर 25 लाख रुपए का इनाम भी घोषित कर रखा था।
पापा राव ने दक्षिण बस्तर में सुरक्षा बलों पर कई जानलेवा हमलों की साज़िश रची थी, जिनमें 2010 का ताड़मेटला हमला (तब के दंतेवाड़ा जिले में था, लेकिन अब सुकमा में है) भी शामिल है। इस हमले में 76 जवान मारे गए थे।
सबसे अहम कमेटी का मुख्य सदस्य था पापा राव
बस्तर संभाग और आसपास के राज्यों के कुछ हिस्सों में माओवादी गतिविधियों को अंजाम देने वाले दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) को इस प्रतिबंधित संगठन की सबसे मजबूत इकाई माना जाता था। पिछले दो दशकों में सुरक्षा बलों पर कई जानलेवा हमले करने में इसकी अहम भूमिका रही है।
अधिकारियों के मुताबिक पापा राव का समर्पण छत्तीसगढ़ में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में एक अहम पड़ाव है। उन्होंने बताया कि यह समर्पण देश के सबसे लंबे समय से चल रहे उग्रवादों में से एक के कमजोर होने का स्पष्ट संकेत है।
बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने कहा, ‘नक्सली संगठन में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी सदस्य तथा साउथ सब जोनल ब्यूरो के इंचार्ज पापा राव का 17 अन्य साथियों के साथ पुनर्वास, क्षेत्र में वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के हमारे सतत प्रयासों में एक निर्णायक सफलता का प्रतीक है।’
नक्सलियों ने AK-47 समेत अन्य हथियार भी सौंपे
सुंदरराज ने बताया कि पापा राव, डिविजनल कमेटी सदस्य प्रकाश मड़वी, अनिल ताती सहित कुल 18 माओवादियों के इस समूह ने हिंसा का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की इच्छा के साथ आत्मसमर्पण किया है। इनमें सात महिला नक्सली भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि नक्सलियों ने आत्मसपर्मण के दौरान एके-47 राइफलें तथा अन्य हथियार भी सौंपे।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि दंडकारण्य क्षेत्र में माओवादी आंदोलन के इतिहास में पहली बार नक्सल संगठन प्रभावी रूप से नेतृत्वविहीन हो गया है। सुंदरराज ने कहा कि सरकार की परिकल्पना और क्षेत्र के लोगों की लंबे समय से रही आकांक्षा के अनुरूप, बस्तर अब एक नई ऊर्जा, नए उत्साह और सकारात्मक पहचान के साथ और अधिक सशक्त होकर उभरने की दिशा में अग्रसर है।
दो दशकों में हुए कई हमलों में शामिल रहा था DKSZC
उन्होंने बताया कि DKSZC बस्तर संभाग और पड़ोसी राज्यों के कुछ हिस्सों में माओवादी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार है और इसे प्रतिबंधित माओवादी संगठन की सबसे मजबूत इकाई माना जाता था। पिछले दो दशकों में सुरक्षा बलों पर कई जानलेवा हमले करने में इसकी अहम भूमिका रही थी।
सुंदरराज ने कहा, ‘हमें आशा है कि शेष बचे माओवादी, जो वर्तमान में छोटे-छोटे समूहों में भटक रहे हैं, भी आने वाले दिनों में हिंसा छोड़ मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लेंगे।’ उन्होंने बताया कि साउथ सब जोनल ब्यूरो इलाके से जुड़े समर्पण करने वाले सभी 18 माओवादियों को औपचारिक रूप से मुख्यधारा में शामिल करने की प्रक्रिया बाद में पूरी की जाएगी।
पापा राव को मंगू के नाम से भी जाना जाता है
इससे पहले दिन में, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, जिनके पास गृह मंत्रालय का प्रभार भी है, ने कहा कि राव, जिन्हें मंगू के नाम से भी जाना जाता है, बस्तर इलाके में अपने दल के एक दर्जन से अधिक सदस्यों के साथ समर्पण करेंगे। शर्मा ने कहा, ‘इस समर्पण के साथ ही, राज्य में उस वरिष्ठ स्तर का कोई भी नक्सली नेता सक्रिय नहीं रहेगा। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ 31 मार्च, 2026 की तय समयसीमा तक सशस्त्र नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा।’
‘कभी पशुपति से तिरुपति तक फैला हुआ था रेड कॉरिडोर’
अधिकारियों ने बताया कि यह समर्पण भाकपा (माओवादी) से जुड़े माओवादी नेटवर्क के बड़े पैमाने पर कमजोर पड़ने का संकेत है, जिसने सालों तक मध्य भारत के बड़े हिस्सों में अपनी समानांतर सत्ता कायम रखी थी। उन्होंने कहा कि ‘रेड कॉरिडोर’ कभी बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों से होते हुए ‘पशुपति से तिरुपति’ तक फैला हुआ था और नक्सलियों के प्रभाव वाले इस गलियारे को देश के लिए ‘सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती’ माना जाता था। अधिकारियों ने बताया कि इस इलाके में शासन-प्रशासन कमज़ोर पड़ गया था, और माओवादियों ने हाशिए पर पड़े समुदायों के बीच जोर-जबरदस्ती और सहमति, दोनों के जरिए अपना प्रभाव जमा रखा था।
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