
नई दिल्ली: दिल्ली में सरकारी नौकरी पाने का सपना एक व्यक्ति के लिए आसान नहीं था. उसे इस मुकाम तक पहुंचने में पूरे 17 साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. मामला आरक्षण से जुड़ा था, जिसने उसकी राह में बड़ी बाधा खड़ी कर दी थी. सभी योग्यताएं पूरी करने के बावजूद उसे नौकरी से वंचित कर दिया गया. आखिरकार दिल्ली उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उसे न्याय मिला और अब 46 साल की उम्र में उसे दिल्ली परिवहन निगम में ड्राइवर की नौकरी मिलने जा रही है. यह मामला आरक्षण से जुड़े नियमों पर भी अहम सवाल खड़े करता है.
एक व्यक्ति ने डीटीसी में ड्राइवर बनने के लिए 17 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी. आखिरकार दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और विभाग को दो महीने के भीतर उसे नियुक्ति देने का आदेश दिया. इस फैसले के बाद अब 46 साल की उम्र में उसे नौकरी मिलने का रास्ता साफ हो गया है.
इस पूरे मामले की जड़ आरक्षण नियमों में अंतर था. याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश का निवासी है, जहां उसकी जाति अनुसूचित जाति में आती है, लेकिन दिल्ली में उसी जाति को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता. इसी वजह से डॉक्यूमेंट वैरीफिकेशन के दौरान उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई, जबकि उसने रिटन एग्जाम और स्किल ट्रेनिंग दोनों पास कर लिए थे.
व्यक्ति ने वर्ष 2009 में डीएसएसएसबी के माध्यम से डीटीसी में ड्राइवर पद के लिए आवेदन किया था. उस समय उसकी उम्र 29 साल थी. उसने सभी चयन प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक पूरी कीं, लेकिन केवल आरक्षण के कारण उसे नौकरी नहीं मिल पाई. इसके बाद उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है, जहां देशभर से लोग रोजगार के लिए आते हैं. ऐसे में अन्य राज्यों के आरक्षण को मान्यता देना कानून के अनुरूप है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि नियुक्ति से पहले संबंधित विभाग उसकी वर्तमान योग्यता की जांच कर सकता है.
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में 2018 के सुप्रीम कोर्ट के बीर सिंह बनाम दिल्ली जल बोर्ड मामले का उल्लेख किया. इसमें कहा गया था कि केंद्रशासित प्रदेशों में दूसरे राज्यों के अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को उनके राज्य के अनुसार आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है. इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत दी.
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