नई दिल्ली। पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी (Galwan Valley in eastern Ladakh) में 2020 में हुई भारत-चीन सैन्य झड़प (India-China military clash) को लेकर पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे (Manoj Mukund Naravane) ने साफ कहा है कि उस संकट के दौरान भारतीय सेना को “उसके हाल पर नहीं छोड़ा गया था”। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि उन्हें सरकार का पूरा समर्थन मिला था और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की पूरी छूट भी थी।
“गोली चलाने का अधिकार था”
एक इंटरव्यू में नरवणे ने बताया कि उस समय उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे और अगर हालात बिगड़ते, तो सेना को आत्मरक्षा में गोली चलाने की अनुमति थी। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि सेना बिना दिशा-निर्देश के काम कर रही थी।
राहुल गांधी के दावे से असहमति
यह बयान उस विवाद के बाद आया है, जिसमें राहुल गांधी ने लोकसभा में दावा किया था कि नरवणे की अप्रकाशित किताब “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” में संकेत है कि सरकार ने सेना को खुद फैसले लेने के लिए छोड़ दिया था।
इस पर नरवणे ने स्पष्ट किया कि उनकी किताब में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे गलतफहमी पैदा हो।
“जमीनी हालात के हिसाब से फैसला जरूरी”
पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि उन्हें अपनी समझ के अनुसार निर्णय लेने की आजादी दी गई थी, क्योंकि जमीनी हालात की बेहतर जानकारी सेना नेतृत्व के पास ही होती है। उनके मुताबिक, यह सरकार के भरोसे को दिखाता है, न कि जिम्मेदारी से पीछे हटने को।
जब हालात बेहद नाजुक थे
दरअसल, यह पूरा विवाद उस समय से जुड़ा है जब भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने थीं और स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी। पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे और रेचिन ला जैसे रणनीतिक इलाकों में टकराव की आशंका बढ़ गई थी।
“शीर्ष पर व्यक्ति अकेला होता है, लेकिन समर्थन पूरा होता है”
नरवणे ने कहा कि नेतृत्व की भूमिका में निर्णय लेना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप अकेले हैं। उन्होंने कहा, “पूरा देश और पूरी सेना आपके साथ खड़ी होती है—यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।”
गौरतलब है कि जून 2020 की गलवान झड़प भारत-चीन संबंधों में एक बड़ा मोड़ थी, जिसमें दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। उस समय सेना की कमान एमएम नरवणे के हाथों में ही थी।
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