
कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) के पहले चरण में 92 प्रतिशत से ज्यादा मतदान (Voting) ने सियासी मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। इस बार एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि चुनावी नैरेटिव गढ़ने में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) से आगे दिखाई दे रही है, जबकि जमीनी स्तर पर बूथ मैनेजमेंट अब भी TMC की सबसे मजबूत कड़ी बना हुआ है।
पहले चरण में भाजपा के बूथ पहले की तरह खाली नहीं दिखे, जिससे मुकाबला अब सिर्फ वोटों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और संगठनात्मक मजबूती का भी हो गया है। इसी के चलते दोनों दलों ने अपनी रणनीतियों में बदलाव किया है। भाजपा जहां दूसरे चरण की 142 सीटों पर बूथ स्तर की कमजोरियों को दूर करने में जुटी है, वहीं तृणमूल अपने मजबूत ग्राउंड नेटवर्क के सहारे भाजपा के नैरेटिव का जवाब देने की तैयारी में है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हुगली में नाव चलाना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य माहौल को और धार देना है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद मोर्चा संभालते हुए भाजपा और अमित शाह पर हमले तेज कर दिए हैं, ताकि जमीनी स्तर पर अपना पक्ष मजबूत किया जा सके।
रिकॉर्ड मतदान पर सियासी व्याख्या
पहले चरण में लगभग 93 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ, जो पिछले चुनावों की तुलना में काफी अधिक है। 2011 में यह आंकड़ा 84.7 प्रतिशत और 2021 में करीब 82 प्रतिशत था। इतनी अधिक वोटिंग को लेकर अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। भाजपा इसे सत्ता विरोधी लहर बता रही है, जबकि तृणमूल इसे महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं का समर्थन मान रही है।
दावों की जंग और मनोवैज्ञानिक दबाव
मतदान के बाद अमित शाह ने 152 में से 110 सीटें जीतने का दावा किया, जबकि शुभेंदु अधिकारी ने इसे बढ़ाकर 125 सीटों तक बताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये दावे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। इसके जवाब में ममता बनर्जी ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए भारी मतदान को अपनी नीतियों और बंगाल की अस्मिता के समर्थन के रूप में पेश किया।
दूसरे चरण की असली चुनौती
अब नजर दूसरे चरण की 142 सीटों पर है, जहां कोलकाता और प्रेसिडेंसी क्षेत्र के शहरी वोटर निर्णायक भूमिका निभाएंगे। पारंपरिक रूप से ‘भद्रलोक’ कहे जाने वाले इस वर्ग में मतदान प्रतिशत कम रहता है। 2021 में जहां राज्य का औसत मतदान 82 प्रतिशत था, वहीं कोलकाता में यह करीब 62-63 प्रतिशत ही रहा। भाजपा का मानना है कि अगर शहरी वोटिंग बढ़ती है, तो उसे सीधा फायदा मिल सकता है।
रणनीति में बदलाव
दूसरे चरण के लिए दोनों दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने पहले चरण से फ्री हुए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारकर घर-घर संपर्क अभियान शुरू किया है। वहीं तृणमूल ने भी ‘मैन-टू-मैन’ रणनीति अपनाते हुए अपने कोर वोटर को साधने और विपक्ष के प्रभाव को रोकने पर जोर दिया है।
4 मई तक बढ़ेगी सियासी सरगर्मी
पहले चरण के रिकॉर्ड मतदान ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं। अब दूसरे चरण में मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रों में ध्रुवीकरण, घुसपैठ और भ्रष्टाचार बनाम बंगाली अस्मिता जैसे मुद्दों पर सीधी टक्कर देखने को मिल सकती है। नतीजे 4 मई को आएंगे, लेकिन इतना साफ है कि इस बार चुनाव सिर्फ नारों का नहीं, बल्कि बूथ स्तर की असली परीक्षा बन गया है। जीत उसी की होगी, जो मतदाताओं को घर से निकालकर मतदान केंद्र तक लाने में सफल रहेगा।
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