नई दिल्ली। बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल के बीच भारत ने अपनी समुद्री ताकत (sea power) को और मजबूत किया है। भारतीय नौसेना (Indian Navy) के बेड़े में अरिहंत श्रेणी की एक और परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (INS) अरिदमन के जुड़ने की खबर ने रणनीतिक हलकों में ध्यान खींचा है।
INS अरिदमन, अरिहंत-क्लास की उन्नत पनडुब्बी मानी जाती है। इस तरह की पनडुब्बियां (SSBN) समुद्र में छिपकर लंबे समय तक तैनात रह सकती हैं और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई की क्षमता देती हैं। यह भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) को मजबूत करने का हिस्सा है।
भारत की सुरक्षा रणनीति में “न्यूक्लियर ट्रायड”—यानी जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु जवाब देने की क्षमता—महत्वपूर्ण मानी जाती है। INS अरिहंत के बाद इस तरह की और पनडुब्बियों का जुड़ना इस ट्रायड को अधिक विश्वसनीय बनाता है।
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक गतिविधियों के चलते भारत के लिए समुद्री सुरक्षा अहम हो गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबी दूरी तक गश्त करने और छिपकर ऑपरेशन करने वाली पनडुब्बियां समुद्री संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।
भारत का SSBN कार्यक्रम लंबे समय से चल रहा है, जिसमें भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और अन्य रक्षा संस्थानों की अहम भूमिका रही है। इन पनडुब्बियों में स्वदेशी तकनीक, न्यूक्लियर रिएक्टर और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता का समावेश किया गया है।
भारत भविष्य में S4 और S5 जैसी और उन्नत पनडुब्बियों पर भी काम कर रहा है, जिनमें अधिक रेंज, बेहतर स्टेल्थ और ज्यादा क्षमता की उम्मीद है। साथ ही, अटैक सबमरीन (SSN) प्रोग्राम पर भी ध्यान दिया जा रहा है, ताकि समुद्र में निगरानी और सुरक्षा और मजबूत हो सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी पनडुब्बियों का उद्देश्य आक्रामकता नहीं बल्कि “विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता” (credible deterrence) बनाए रखना होता है। भारत की नीति ‘नो फर्स्ट यूज’ पर आधारित है, लेकिन जवाबी क्षमता मजबूत रखना उसकी सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।
कुल मिलाकर, INS अरिदमन जैसे प्लेटफॉर्म भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
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