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इंदौर के कई निजी व सरकारी कॉलेज दिव्यांग विद्यार्थियों का हक देने में पीछे

June 04, 2026

913 भवनों की जांच में खुली हकीकत, ब्रेल बोर्ड 96 प्रतिशत परिसरों से गायब, 71 प्रतिशत जगह व्हीलचेयर तक नहीं

सुगम परिसर बनाने में फिसड्डी निकले शिक्षण संस्थान व जनजातीय विभाग

इंदौर। प्रदेश (State) में समावेशी शिक्षा और दिव्यांग (disabilities) अधिकारों के बड़े-बड़े दावों के बीच इंदौर जिले की सुगम्य अभियान रिपोर्ट ने सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों (educational establishments) की संवेदनहीनता उजागर कर दी है। कॉलेजों और शैक्षणिक परिसरों में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। हालत यह है कि जहां शिक्षा के मंदिरों को सबसे अधिक सुलभ होना चाहिए, वहीं दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए प्रवेश से लेकर शौचालय तक संघर्ष का विषय बना हुआ है।



  • जिले में 913 भवनों के निरीक्षण में सामने आया कि केवल 35 भवनों में ब्रेल सूचनापट्ट मिले। यानी 96.2 प्रतिशत परिसरों में दृष्टिबाधितों के लिए कोई सूचना व्यवस्था नहीं है। इसी तरह साइन लैंग्वेज की सुविधा मात्र 31 भवनों (3.4 प्रतिशत) में पाई गई। यह आंकड़ा बताता है कि श्रवण बाधित विद्यार्थियों को आज भी संस्थानों में लगभग नजरअंदाज किया जा रहा है। सुगमता की स्थिति जांचने में जनजातीय कल्याण विभाग सबसे पीछे रहा, जहां 87 भवनों के लक्ष्य के मुकाबले केवल 2 भवनों का निरीक्षण हुआ, वहीं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय भी 85 के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 38 भवनों तक पहुंच पाया। दूसरी ओर शिक्षा विभाग ने लक्ष्य से अधिक निरीक्षण कर 103 प्रतिशत उपलब्धि दर्ज की।

    रैम्प बने, लेकिन सुरक्षा भगवान भरोसे
    रिपोर्ट के अनुसार 913 में से 550 भवनों में रैम्प तो हैं, लेकिन इनमें से 300 रैम्प बिना रैलिंग के पाए गए। यानी आधे से अधिक रैम्प दिव्यांगजन और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित ही नहीं हैं। ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई व्यवस्थाएं केवल दिखावा साबित हो रही हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि सम में भारत के तहत सरकार द्वारा लगभग 19 करोड़ रुपए देने का वादा किया गया था, लेकिन तीन करोड़ रुपए ही दिए गए हैं, जिसके कारण काम अधूरे पड़े हुए हैं।

    देवी अहिल्या विश्वविद्यालय भी पीछे…
    उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से जुड़े 85 परिसरों के लक्ष्य के मुकाबले केवल 38 का ही निरीक्षण हो पाया। इससे स्पष्ट है कि शैक्षणिक परिसरों में सुगमता का मुद्दा अभी प्राथमिकता में नहीं है।
    सबसे शर्मनाक आंकड़े
    ब्रेल सूचना पट्ट 3.8 प्रतिशत
    साइन लैंग्वेज सुविधा 3.4 प्रतिशत
    टैक्टाइल पथ 9.6 प्रतिशत
    लिफ्ट उपलब्धता 15.1 प्रतिशत
    व्हीलचेयर उपलब्धता 28.7 प्रतिशत
    दिव्यांग अनुकूल शौचालय 27.9 प्रतिशत

    कहां कितना लक्ष्य… कितना पूरा
    सुगम्य अभियान के तहत जिले में 1125 भवनों के निरीक्षण का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें अब तक 913 भवनों का निरीक्षण पूरा हो चुका है। यानी कुल 81 प्रतिशत प्रगति हुई है, जबकि 311 भवनों का निरीक्षण अभी शेष है।
    जिला पंचायत-लक्ष्य 338, निरीक्षण 281, शेष 57
    शिक्षा विभाग -लक्ष्य 150, निरीक्षण 154, लक्ष्य से 4 अधिक
    लीड बैंक-लक्ष्य 150, निरीक्षण 140, शेष 10
    देवी अहिल्या विश्वविद्यालय-लक्ष्य 85, निरीक्षण 38, शेष 47
    जनजातीय कल्याण विभाग-लक्ष्य 87, निरीक्षण 2, शेष 85 (सबसे खराब प्रदर्शन)
    खाद्य एवं औषधि विभाग- लक्ष्य 45, निरीक्षण 45, लक्ष्य पूर्ण
    उद्योग विभाग-लक्ष्य 44, निरीक्षण 43, शेष 1
    पुलिस विभाग-लक्ष्य 40, निरीक्षण 36, शेष 4
    नगर निगम-लक्ष्य 32, निरीक्षण 29, शेष 3
    स्वास्थ्य विभाग-लक्ष्य 30, निरीक्षण 28, शेष 2

    71 प्रतिशत भवनों में व्हीलचेयर सुगम शौचालय नहीं
    सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 913 में से सिर्फ 262 भवनों में व्हीलचेयर उपलब्ध मिली। यानी 651 भवनों (71.3 प्रतिशत) में व्हीलचेयर की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि कोई दिव्यांग विद्यार्थी अभिभावक या आगंतुक परिसर पहुंचे तो उसे अपनी व्यवस्था स्वयं करनी होगी। रिपोर्ट के मुताबिक केवल 354 भवनों में सुलभ शौचालय हैं, जबकि व्हीलचेयर अनुकूल शौचालय सिर्फ 255 भवनों में मिले। अलग से दिव्यांग शौचालय की सुविधा तो केवल 212 भवनों तक सीमित है। यह स्थिति तब है, जब दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम ऐसे प्रावधानों को अनिवार्य मानता है।

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