
इंदौर। इंदौर (Indore) जिले में हर मंगलवार आयोजित जनसुनवाई (Public grievance hearing) में लगभग 350 शिकायतें पहुंचती हैं। इस मान से हर महीने 1400 आवेदक कलेक्टर कार्यालय (Collector’s Office) के चक्कर काटने को मजबूर हैं, लेकिन अधिकारियों के कानों में जूं भी नहीं रेंगती। आम जनता की परेशानी आज भी जस की तस नजर आती है। आर्थिक सहायता, छात्रों, वृद्धों की मदद के साथ इक्का-दुक्का मामलों में ही सुनवाई हो रही है। वर्तमान कलेक्टर के कार्यकाल में लगभग 12000 से अधिक शिकायतें आईं, लेकिन जवाब और निराकरण सिर्फ 3000 को ही मिले हैं।
जिले में हर मंगलवार को आयोजित हो रही जनसुनवाई में सुबह 10 बजे पहुंचने के बाद भी 1.30 बजे तक आवेदक कलेक्टर से मिलने की जिद पर अड़े रहते हैं। नतीजा यह होता है कि कलेक्टर के आने तक अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं और यदि आवेदक की सुनवाई हो भी जाए तो वह कलेक्टर से बिना मिले नहीं जाता। हर जनसुनवाई में लगभग 30 से ज्यादा अधिकारियों की ड्यूटी लगाई जाती है, उसके बावजूद भीड़ 2.30 बजे तक खत्म नहीं होती। हर मंगलवार लगभग 350 से ज्यादा शिकायतें पहुंचती हैं। कलेक्टर से लेकर हर विभाग के अधिकारी घंटों बैठकर फरियादियों की शिकायतें सुनते हैं और कलेक्टर मौके पर अधिकारियों को त्वरित कार्रवाई के निर्देश भी देते हैं, लेकिन इसके बावजूद महीनों तक सिर्फ धक्के ही नसीब हो रहे हैं। कलेक्टर की इस मेहनत पर उनके ही मातहत अधिकारी पानी फेरते नजर आ रहे हैं। ताजा जनआकांक्षा रिपोर्ट बताती है कि प्रशासन का एक बड़ा हिस्सा शिकायतों के निराकरण से ज्यादा उन्हें फाइलों में दबाने में व्यस्त है। यही कारण है कि कलेक्टर शिवम वर्मा के कार्यकाल में पहुंची लगभग 12,227 शिकायतों में से 8,832 पर अब तक जवाब तक दर्ज नहीं किया गया। केवल 2,978 मामलों में ही जवाब दिया गया।
ग्रामीण तहसीलों, निगम और पुलिस की स्थिति निराशाजनक
सबसे खराब स्थिति नगर निगम की है। 1,732 शिकायतों में से 1,293 लंबित हैं। एसडीएम मल्हारगंज में 582 में 328 शिकायतों पर जवाब नहीं मिला। सबसे चौंकाने वाला रिकॉर्ड एसडीएम सांवेर का है, जहां 564 शिकायतों में एक भी जवाब दर्ज नहीं हुआ। आंकड़ों में पुलिस विभाग की तस्वीर भी बेहद निराशाजनक है। एडीसीपी जोन-4 की 479, जोन-3 की 380 और ग्रामीण पुलिस अधीक्षक की 336 शिकायतों पर शून्य कार्रवाई दर्ज है। वहीं एडीसीपी जोन-1 ने 472 शिकायतों में केवल एक और एसडीएम देपालपुर ने 323 में सिर्फ एक शिकायत पर जवाब दिया। कुल 17 विभाग ऐसे हैं, जिन्होंने एक भी शिकायत का जवाब देना जरूरी नहीं समझा।
सफाई… सभी शिकायतें लापरवाही का परिणाम नहीं
हालांकि अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट में लंबित दिख रही सभी शिकायतें लापरवाही का परिणाम नहीं हैं। कई मामलों में विभागीय कार्रवाई पूरी हो चुकी है, लेकिन शिकायतकर्ता समाधान से संतुष्ट नहीं होने के कारण प्रकरण बंद नहीं हो पा रहे हैं। कुछ शिकायतें ऐसी भी हैं, जो शासन स्तर से बजट या स्वीकृति मिलने पर ही हल हो सकती हैं, इसलिए वे तकनीकी रूप से लंबित दिखाई दे रही हैं। इसके बावजूद सवाल बना हुआ है कि जिन विभागों ने एक भी जवाब दर्ज नहीं किया, उनकी जवाबदेही आखिर कब तय होगी।
अमलीजामा नहीं पहना पा रहे
हालात यह हैं कि उच्च अधिकारियों के निर्देश के बावजूद महिला एवं बाल विकास, पुलिस, शिक्षा, सामाजिक न्याय, खाद्य, स्वास्थ्य, बिजली और राजस्व जैसे विभागों में भी सैकड़ों शिकायतें महीनों से लंबित पड़ी हैं। सवाल यह है कि जब कलेक्टर स्वयं जनता के बीच बैठकर समाधान की कोशिश कर रहे हैं तो उनके आदेशों को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी आखिर किसके भरोसे बैठे हैं।
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