प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने दुष्कर्म से जन्मे बच्चों के अधिकारों और सम्मान को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी बच्चे के जन्म की परिस्थितियां उसके मानवीय मूल्य को कम नहीं करतीं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि दुष्कर्म (Repe) से जन्मा बच्चा किसी भी तरह से ‘कलंक’ का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह भी समान सम्मान और गरिमा का अधिकार रखता है।
कोर्ट ने कहा कि समाज को बच्चे के जन्म की परिस्थितियों के बजाय पीड़िता के साथ हुई हिंसा, शोषण और अन्याय को असली कलंक मानना चाहिए। अदालत ने ऐतिहासिक उदाहरणों का जिक्र करते हुए कहा कि कई महान व्यक्तित्व कठिन और विषम परिस्थितियों में जन्म लेने के बावजूद इतिहास में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं।
लापरवाही के कारण नहीं हो सका गर्भपात
मामला मेरठ की एक पीड़िता से जुड़ा था, जिसने गर्भपात की इच्छा जताई थी। हालांकि, अदालत के अनुसार मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO), पुलिस और बाल कल्याण समिति की कथित लापरवाही के चलते 54 दिन बीत गए, जिसके बाद गर्भपात कानूनी और चिकित्सकीय रूप से संभव नहीं रह गया।
कोर्ट ने इस स्थिति को व्यवस्थागत विफलता बताते हुए कहा कि कानून में प्रावधान होने के बावजूद नौकरशाही की सुस्ती के कारण पीड़िता को अनावश्यक संघर्ष का सामना करना पड़ा।
मेडिकल बोर्ड की व्यवस्था पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य के कई जिलों में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत आवश्यक मेडिकल बोर्ड या तो गठित नहीं किए गए या प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं। अदालत ने सभी जिलों में मेडिकल बोर्ड के गठन और उनकी सक्रियता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
रिपोर्ट के हवाले से कोर्ट ने कहा कि झांसी, गोंडा और प्रयागराज जैसे जिलों में MTP एक्ट लागू होने के दशकों बाद, वर्ष 2023 में मेडिकल बोर्ड बनाए गए, जो गंभीर प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
दुष्कर्म से जन्मे बच्चों के लिए अलग कानून की जरूरत
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में फिलहाल ऐसा कोई विशेष कानून नहीं है, जो दुष्कर्म से जन्मे बच्चों के स्वतंत्र अधिकारों और संरक्षण को सुनिश्चित करता हो। अदालत ने ब्रिटेन, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड के कानूनों का उल्लेख करते हुए प्रदेश सरकार को सुझाव दिया कि ऐसे बच्चों के लिए अलग कानूनी ढांचा तैयार किया जाए।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि दुष्कर्म से जन्मे बच्चों को पीड़ित का दर्जा दिया जाए और उन्हें मुआवजा, शिक्षा, स्वास्थ्य, देखभाल तथा पुनर्वास का अधिकार मिले। साथ ही, गोद लेने की स्पष्ट नीति भी बनाई जाए।
अदालत ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देते हुए कहा कि तब तक जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ऐसे बच्चों के हितों की निगरानी करेगा।
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