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CEC चयन प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल, पूछा- पैनल में CJI क्यों नहीं? केंद्र ने संसद के अधिकार का दिया हवाला

July 31, 2026

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट (SC) में सुनवाई के दौरान अहम संवैधानिक सवाल उठे। अदालत ने पूछा कि जब सीबीआई निदेशक और लोकपाल के चयन में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की भूमिका होती है, तो चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की नियुक्ति प्रक्रिया से उन्हें बाहर क्यों रखा गया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग न केवल स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि उसकी स्वतंत्रता दिखाई भी देनी चाहिए।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ 2023 के उस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।


  • कोर्ट ने उठाए स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल

    सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र दिखाई देना भी उतना ही जरूरी है। अदालत ने सवाल किया कि जब अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों के चयन में मुख्य न्यायाधीश शामिल रहते हैं, तो चुनाव आयोग के मामले में अलग व्यवस्था क्यों अपनाई गई।

    फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस मांग पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने का अनुरोध किया गया है।

    2023 के कानून पर क्या है विवाद?

    मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के तहत निर्देश दिया था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सिफारिश पर की जाएगी।

    इसके बाद संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया। नए कानून में चयन समिति से CJI को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया। इसी बदलाव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

    केंद्र सरकार ने क्या कहा?

    अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि संसद के विधायी निर्णयों पर केवल इसलिए सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि कोई दूसरा मॉडल भी संभव है। उनका तर्क था कि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है और न्यायपालिका को विधायिका के विवेक का सम्मान करना चाहिए।

    सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों संविधान के स्वतंत्र स्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा और निर्णयों पर भरोसा किया जाना चाहिए तथा यह मानकर नहीं चला जा सकता कि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत काम करेगी।

    सुप्रीम कोर्ट का जवाब

    पीठ ने स्पष्ट किया कि मामला प्रधानमंत्री पर अविश्वास का नहीं, बल्कि संस्थागत निष्पक्षता का है। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होने के साथ-साथ निष्पक्ष दिखाई भी दे।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि उसका उद्देश्य चयन समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का संदेह न रहे।

    संविधान पीठ को भेजने की मांग का विरोध

    केंद्र सरकार ने मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने का आग्रह किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी. शेषाद्रि नायडू, गोपाल शंकरनारायणन, प्रशांत भूषण और संजय पारिख ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि करीब 20 दिनों की सुनवाई पूरी होने के बाद इस स्तर पर मामला संविधान पीठ को भेजने की मांग उचित नहीं है।

    अब सुप्रीम कोर्ट केंद्र की इस मांग और 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाएगा।

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