
नई दिल्ली। आने वाले वर्षों में भारत की सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियां केवल स्मार्ट ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे से संवाद करने में भी सक्षम होंगी। केंद्र सरकार सड़क सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए व्हीकल-टू-व्हीकल (V2V) कम्युनिकेशन सिस्टम को नए वाहनों में अनिवार्य करने की तैयारी कर रही है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने इस संबंध में एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है।
क्या है V2V कम्युनिकेशन सिस्टम?
V2V (Vehicle-to-Vehicle) ऐसी तकनीक है, जिसमें वाहन वायरलेस नेटवर्क के जरिए आसपास चल रही अन्य गाड़ियों से रियल-टाइम में जानकारी साझा करते हैं। इसमें वाहन अपनी स्पीड, लोकेशन, दिशा और एक्सीलरेशन जैसी जानकारियां एक-दूसरे तक पहुंचाते हैं। यदि आगे चल रही कोई गाड़ी अचानक ब्रेक लगाती है, लेन बदलती है या सड़क पर दुर्घटना होती है, तो पीछे आ रहे वाहन को पहले ही अलर्ट मिल जाएगा। इससे चालक समय रहते सतर्क हो सकेगा और हादसों की संभावना कम होगी।
ADAS का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक तकनीक
सरकार ने स्पष्ट किया है कि V2V तकनीक मौजूदा ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) की जगह नहीं लेगी। कैमरा, रडार और सेंसर आधारित सुरक्षा प्रणाली के साथ मिलकर यह तकनीक सड़क सुरक्षा को और प्रभावी बनाएगी। इसके लिए दूरसंचार विभाग (DoT) ने 5.875 GHz से 5.925 GHz फ्रीक्वेंसी बैंड भी निर्धारित किया है, जिससे वाहन आपस में तेज और सुरक्षित डेटा साझा कर सकेंगे।
कब से लागू होगा नियम?
ड्राफ्ट के अनुसार, 1 अक्टूबर 2028 से बनने वाले L, M और N श्रेणी के सभी नए वाहनों में V2V सिस्टम अनिवार्य किया जा सकता है।
L कैटेगरी: दोपहिया और तिपहिया वाहन
M कैटेगरी: कार, बस और अन्य यात्री वाहन
N कैटेगरी: ट्रक और हल्के व्यावसायिक वाहन
वहीं जिन वाहनों में यह तकनीक पहले से उपलब्ध होगी, उन्हें 1 अक्टूबर 2027 से नए मानकों के अनुरूप अपडेट करना होगा। सरकार का मानना है कि चरणबद्ध लागू करने से वाहन निर्माता और कंपोनेंट कंपनियों को तकनीक विकसित करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
दुनिया में कहां-कहां हो रहा इस्तेमाल?
चीन, जापान, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में V2V और V2X (Vehicle-to-Everything) तकनीक पर काम चल रहा है। फिलहाल अधिकांश देशों में यह पायलट या सीमित स्तर पर उपयोग में है। कनेक्टेड व्हीकल तकनीक के मामले में चीन सबसे आगे माना जाता है, जबकि जापान V2X सिस्टम पर अधिक जोर दे रहा है।
प्राइवेसी को लेकर भी चिंता
इस तकनीक में वाहन केवल संचालन से जुड़ा डेटा साझा करेंगे। ड्राइवर का नाम, मोबाइल नंबर या अन्य व्यक्तिगत जानकारी साझा नहीं होगी। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रा के पैटर्न और वाहन संबंधी डेटा के दुरुपयोग या थर्ड पार्टी एक्सेस को लेकर स्पष्ट नियम बनाना जरूरी होगा।
बढ़ सकती हैं वाहनों की कीमतें
नई तकनीक को वाहनों में शामिल करने से उनकी निर्माण लागत बढ़ सकती है, जिसका असर कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, सड़क दुर्घटनाओं में कमी और बेहतर सुरक्षा को देखते हुए इसे भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीक माना जा रहा है।
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