
जो बड़े नेता समझ रहे थे कि किसी को भी खड़ा कर देंगे वह पार्टी के नाम से जीत जाएगा तो सबसे पहले भाजपा को दतिया और बांकीपुर के नतीजों पर गौर करना चाहिए। भाजपा को अंदरूनी चोट तो लगी है, जो ऊपर से दिख नहीं है, लेकिन जो हुआ है उसमें कार्यकर्ताओं की जीत मानी जा रही है। कभी कार्यकर्ताओं को देवतुल्य मानने वाली भाजपा में पिछले कुछ दिनों से जो अहं भरा हुआ है, वो अहं दो दिन पहले तार-तार होते दिखा। भले ही कार्यकर्ता बाहरी तौर पर कुछ नहीं कह रहा हो, लेकिन अंदर ही अंदर खुश है कि चलो कार्यकर्ताओं की महत्ता तो समझ में आई कि बिना कार्यकर्ता किसी संगठन का आगे बढ़ना कितना मुश्किल होता है। जिन लोगों ने संगठन में अपनी जान गंवा दी, उन लोगों के सपनों को पूरा करने का वक्त आया, लेकिन पार्टी व्यक्ति प्रधान बनने लगी। आशुतोष तिवारी अगर दतिया से जीत जाते तो भाजपा चुनाव लड़ने की परिभाषा बदल देती और फ्रंटलाइन में आए नेताओं को अगले चुनाव 2028 में घर बिठा दिया जाता, क्योंकि जिस लाइन पर पार्टी जा रही थी, उससे तो ऐसा ही लग रहा था। नए चेहरों पर दांव लगाना और पुरानों को दरकिनार कर देना यह भाजपा ने अपने संशोधित संविधान में तय कर लिया था। दरअसल ये कार्यकर्ताओं की जीत ही कही जाएगी, जो पार्टी में अपना एक मुकाम पाना चाहते हैं। बेचारे कई कार्यकर्ता तो जीवनभर कार्यकर्ता ही रहते हैं और एक छोटे से पद की लालसा में इंतजार करते रहते हैं। ताजा उदाहरण संगठन में राजनीतिक नियुक्तियों का हो या फिर सत्ता में मलाईदार पद पाना हो, लंबे समय से कार्यकर्ताओं को भाजपा ने अटका रखा है। इससे भी कार्यकर्ता हताश और निराश हैं। कुल मिलाकर दतिया और बांकीपुर से हारने के बाद भाजपा को आत्मचिंतन के दौर से गुजरना होगा। कार्यकर्ताओं को घर बिठाने से कोई फायदा नहीं होगा, नहीं तो ये संगठन भी एक दिन कांग्रेस जैसा छिन्न-भिन्न हो जाएगा। कांग्रेस के नेताओं ने भी लगातार सत्ता में आने के बाद कार्यकर्ताओं की महत्ता नहीं समझी थी और उसका परिणाम आज उन्हें भुगतना पड़ रहा है। फिर एक बार कहेंगे कि दोनों उपचुनाव में पार्टी की हार तो है ही, वहीं कार्यकर्ताओं की जीत है।
-संजीव मालवीय
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