
हरैया: देश की तरक्की के दावों के बीच यह कहानी उस ग्रामीण भारत की हकीकत बयां करती है, जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं और अधिकार लोगों के लिए एक सपना बने हुए हैं. मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले के बैढ़न ब्लॉक का हरैया गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है. यहां विकास की राह में एक नदी ऐसी बाधा बनकर खड़ी है, जिसे पार किए बिना ग्रामीणों की जिंदगी आगे नहीं बढ़ सकती.
नदी के उस पार बसे 500 से अधिक लोग हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर आना-जाना करने को मजबूर हैं. चाहे बच्चों को स्कूल जाना हो, मरीज को अस्पताल पहुंचाना हो, परिवार के लिए राशन लाना हो या रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकलना हो, हर सफर मौत के डर के साये में शुरू होता है. सालों से ग्रामीण पुल और सड़क निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी सरकारी फाइलों और आश्वासनों के बीच दबकर रह गई है.
हरैया गांव की रोजमर्रा की जिंदगी की इसकी सच्चाई है. यहां नदी के उस पार बसे लोगों के लिए न कोई पुल है, न सुरक्षित रास्ता और न ही आवागमन की कोई स्थायी व्यवस्था. सबसे अधिक चिंता उन बच्चों की है, जो हर दिन स्कूल जाने के लिए इस खतरनाक नदी को पार करते हैं. उनके कंधों पर सिर्फ स्कूल बैग नहीं, बल्कि अपने परिवार की उम्मीदें भी हैं. शिक्षा तक पहुंचने से पहले उन्हें तेज बहाव, फिसलन और हादसे के लगातार मंडराते खतरे का सामना करना पड़ता है. मजबूरी ऐसी है कि जान का जोखिम उठाना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है.
ग्रामीणों का कहना है कि पुल निर्माण की मांग कोई नई नहीं है. सालों से जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने इस समस्या को उठाया जा रहा है. हर चुनाव में वादे किए जाते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन नदी पर पुल बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता. नतीजतन हर बरसात के साथ उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं.
हरैया के लोगों को अब किसी नई योजना, घोषणा या चुनावी वादे का इंतजार नहीं है. उन्हें सिर्फ एक पुल चाहिए, जो केवल नदी के दो किनारों को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ सके. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि हरैया गांव की यह पुकार आखिर कब सुनी जाएगी, या फिर यहां के लोग यूं ही हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर जिंदगी का सफर तय करते रहेंगे.
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