
नई दिल्ली। मस्तिष्क (Meditation)को स्वस्थ रखने के लिए लंबे समय से ध्यान और योग (yoga)को फायदेमंद(considered beneficial) माना जाता रहा है। आमतौर पर मेडिटेशन को तनाव कम करने और मन को शांत रखने से जोड़कर देखा जाता है लेकिन एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसके प्रभाव को लेकर नई संभावनाएं सामने रखी हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन में महज सात दिनों के गहन ध्यान और मन शरीर से जुड़े अभ्यास के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क और शरीर में कई मापने योग्य बदलाव देखे गए। शोधकर्ताओं को मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ रक्त में मौजूद जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा प्रणाली मेटाबॉलिज्म और शरीर की प्राकृतिक दर्द नियंत्रण प्रक्रिया में भी बदलाव के संकेत मिले हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अध्ययन में न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़े बदलावों के संकेत भी दिखाई दिए।
न्यूरोप्लास्टिसिटी मस्तिष्क की वह प्राकृतिक क्षमता है जिसके जरिए वह नए अनुभवों और लगातार किए जाने वाले अभ्यास के आधार पर अपनी कार्यप्रणाली और तंत्रिका संबंधों में बदलाव कर सकता है। आसान भाषा में समझें तो मस्तिष्क पूरी तरह स्थिर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों और अनुभवों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता रखता है। इसी वजह से वैज्ञानिक ध्यान को केवल मानसिक शांति देने वाली गतिविधि के तौर पर नहीं बल्कि मस्तिष्क और शरीर के बीच होने वाली जटिल जैविक प्रक्रिया के रूप में भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।
इस अध्ययन में 20 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों ने सात दिनों के एक आवासीय कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें रोजाना ध्यान से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया और कुल करीब 33 घंटे का निर्देशित ध्यान कराया गया। कार्यक्रम शुरू होने से पहले और समाप्त होने के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क की एफएमआरआई जांच की गई। इसके साथ ही उनके रक्त के नमूने लेकर शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक सात दिन के कार्यक्रम के बाद मस्तिष्क के उन हिस्सों की गतिविधि में कमी देखी गई जो लगातार चलने वाले आंतरिक विचारों और मानसिक बातचीत से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञों ने इसे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में संभावित बेहतर दक्षता से जोड़कर देखा है। इसके अलावा रक्त में मौजूद कुछ जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा गतिविधि और मेटाबॉलिज्म से जुड़े बदलावों का भी अध्ययन किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि ध्यान का असर केवल व्यक्ति के मानसिक अनुभव तक सीमित नहीं हो सकता बल्कि शरीर की कई प्रक्रियाओं से भी इसका संबंध हो सकता है।
हालांकि इस अध्ययन के नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं लेकिन इन्हें अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी। अध्ययन में केवल 20 स्वस्थ वयस्क शामिल थे और इसकी अवधि भी सिर्फ सात दिन रही। इसलिए यह जानने के लिए बड़े स्तर पर और लंबे समय तक शोध की जरूरत होगी कि ध्यान से होने वाले ये बदलाव कितने स्थायी हैं और अलग अलग उम्र तथा स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों पर इनका असर कितना अलग हो सकता है।
फिलहाल यह अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है कि नियमित और गहन ध्यान मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के साथ शरीर की दूसरी जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। यानी ध्यान को सिर्फ तनाव कम करने का माध्यम मानने के बजाय मस्तिष्क और शरीर के समग्र स्वास्थ्य से जुड़ी जीवनशैली की आदत के रूप में भी देखा जा सकता है।
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