नई दिल्ली। अमेरिका और चीन (The United States and China) के बीच अंतरिक्ष तथा सैन्य तकनीक (Space and Military Technology) को लेकर बढ़ते तनाव के बीच दो घटनाओं ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहली घटना जुलाई 2026 में जॉर्डन के मुवफ्फाक साल्ती एयर बेस पर ईरानी मिसाइल (Iranian missile) हमले से जुड़ी है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, हमले से पहले ईरान को चीनी संस्थाओं से इस अमेरिकी सैन्य ठिकाने की हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें मिली थीं। दूसरी घटना चीन के याओगन-50 (02) टोही उपग्रह के अचानक कक्षा में टूटने की है। हालांकि, दोनों घटनाओं के बीच किसी सीधे संबंध की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अमेरिकी बेस पर हमले से पहले मिली थीं तस्वीरें
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, 17 जुलाई को जॉर्डन स्थित मुवफ्फाक साल्ती एयर बेस पर ईरानी मिसाइल हमले से पहले तेहरान को चीनी संस्थाओं से बेस की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें उपलब्ध कराई गई थीं। हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई और चार अन्य घायल हुए। अमेरिकी अधिकारियों ने इन तस्वीरों को चीन की ओर से ईरान को मिली सहायता का अब तक का सबसे स्पष्ट सबूत बताया है। तस्वीरें हमले से पहले और बाद की स्थिति की थीं, जिससे लक्ष्य का चयन और नुकसान का आकलन करने में मदद मिल सकती थी।
हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की सरकार पर सीधे तौर पर इस हमले में शामिल होने का आरोप नहीं लगाया है। उनका जोर चीनी संस्थाओं और कंपनियों की ओर से उपलब्ध कराई गई सैटेलाइट सेवाओं पर है। चीन ने भी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि ईरान के साथ उसका सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है।
पहले भी चीनी सैटेलाइट कंपनियों पर कार्रवाई
अमेरिका पहले ही कुछ चीनी सैटेलाइट कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। वाशिंगटन को आशंका रही है कि ऐसी कंपनियों की ओर से उपलब्ध कराई जाने वाली हाई-रिजॉल्यूशन इमेजरी का इस्तेमाल ईरान सैन्य उद्देश्यों के लिए कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च गुणवत्ता वाली सैटेलाइट तस्वीरें किसी सैन्य ठिकाने की संरचना, संभावित लक्ष्यों और हमले के बाद हुए नुकसान की जानकारी हासिल करने में उपयोगी हो सकती हैं।
ईरान ने हमले के कुछ दिनों बाद मुवफ्फाक साल्ती एयर बेस के नुकसान की विस्तृत तस्वीरें भी जारी की थीं। इन तस्वीरों की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठे और उन्हें सामान्य व्यावसायिक सैटेलाइट स्रोतों से उपलब्ध तस्वीरों की तुलना में बेहतर बताया गया।
करीब छह हफ्ते बाद टूटा चीन का याओगन-50 (02)
इसी घटनाक्रम के बाद चीन के याओगन-50 (02) सैटेलाइट के अचानक टूटने की घटना सामने आई। यह उपग्रह 15 मार्च 2026 को लॉन्ग मार्च-6ए रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था और करीब 950 किलोमीटर की ऊंचाई पर बेहद असामान्य रेट्रोग्रेड ऑर्बिट में काम कर रहा था। 4 सितंबर को अमेरिकी स्पेस फोर्स ने इसके टूटने से जुड़े कम से कम 43 मलबे के टुकड़े दर्ज किए। ये टुकड़े लगभग 600 से 1,100 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच फैले हैं।
इस ऊंचाई पर वायुमंडलीय खिंचाव बहुत कम होने के कारण मलबे के लंबे समय तक कक्षा में बने रहने की आशंका है। इससे दूसरे उपग्रहों के लिए टकराव का खतरा बढ़ सकता है। उपलब्ध जानकारी में उपग्रह के टूटने का आधिकारिक कारण स्पष्ट नहीं है। विशेषज्ञों ने तकनीकी खराबी सहित कई संभावनाओं का उल्लेख किया है, लेकिन किसी एक कारण की पुष्टि नहीं हुई है।
याओगन श्रृंखला को लेकर क्या जानते हैं?
याओगन श्रृंखला के उपग्रहों को चीन आधिकारिक तौर पर रिमोट सेंसिंग, भूमि सर्वेक्षण और अन्य नागरिक उपयोगों से जोड़ता है। वहीं, खुले स्रोतों में इस श्रृंखला के कई उपग्रहों को सैन्य निगरानी से जुड़ा माना जाता है। याओगन-50 श्रृंखला के उपग्रहों की असामान्य रेट्रोग्रेड कक्षा को देखते हुए विशेषज्ञों ने इनके संभावित सैन्य और रडार संबंधी उपयोग पर भी चर्चा की है।
क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध है?
फिलहाल ऐसा कोई ठोस सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि ईरान को चीनी सैटेलाइट तस्वीरें मिलने और याओगन-50 (02) के टूटने की घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। उपग्रह के टूटने का कारण भी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है। इसलिए इसे किसी हमले, तोड़फोड़ या अमेरिकी कार्रवाई से जोड़ना अभी अटकल ही होगा।
हालांकि, इन घटनाओं का समय और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती तकनीकी एवं सैन्य प्रतिस्पर्धा ने सवाल जरूर खड़े किए हैं। अंतरिक्ष में उत्पन्न मलबे के कारण दूसरे उपग्रहों के लिए खतरा बढ़ने के साथ-साथ यह घटनाक्रम यह भी दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट इमेजरी और अंतरिक्ष आधारित खुफिया जानकारी कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।
अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही तकनीक, सैन्य क्षमता और अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा चल रही है। ऐसे में ईरान को कथित चीनी सैटेलाइट सहायता और एक चीनी टोही उपग्रह के टूटने की घटनाएं आने वाले समय में अंतरिक्ष सुरक्षा तथा सैन्य उपयोग वाली सैटेलाइट तकनीक को लेकर बहस को और तेज कर सकती हैं।
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