
जबलपुर। सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के दावे एक बार फिर खोखले साबित हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश स्कूलों में बच्चे आज भी हैंडपंप, बोरिंग और कुओं का पानी पीकर प्यास बुझा रहे हैं। यह पानी कितना सुरक्षित है, इसकी नियमित जांच और निगरानी की जिम्मेदारी जिन विभागों पर है, वे केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नजर आ रहे हैं। हालात यह हैं कि स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक तक वहां का पानी पीने से परहेज करते हैं और अपने घर से बोतल भरकर लाते हैं। जब शिक्षकों को ही स्कूल के पानी पर भरोसा नहीं, तो बच्चों की सेहत की चिंता किसे है?
प्राथमिक स्कूलों के बच्चे सबसे ज्यादा जोखिम में
ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं की संख्या अधिक है। इन्हीं स्कूलों के छोटे बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित स्थिति में हैं। कई जगह बच्चे हैंडपंप और कुओं का पानी पी रहे हैं, जबकि इन जलस्रोतों की गुणवत्ता को लेकर नियमित जांच की व्यवस्था स्पष्ट नहीं है। छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर दूषित पानी का गंभीर असर पड़ सकता है, इसके बावजूद इन स्कूलों के पेयजल को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई दे रही। स्कूलों में पानी की जांच होने और रिपोर्ट में पानी को शुद्ध बताए जाने के दावों के बावजूद शिक्षकों का भरोसा कायम नहीं है। दावा किया जा रहा है कि करीब 90 प्रतिशत सरकारी स्कूलों के शिक्षक अपना पीने का पानी घर से लेकर आते हैं। यदि स्कूल का पानी वास्तव में सुरक्षित है, तो शिक्षक खुद उसका इस्तेमाल क्यों नहीं करते? पूर्व शिक्षा अधिकारी की ओर से शिक्षकों को स्कूल का पानी पीने की सलाह भी दी गई थी, लेकिन इसका असर नहीं हुआ।
हर दो-तीन महीने में जांच का निर्देश, अमल नदारद
शिक्षकों के अनुसार, शासन ने दो या तीन महीने में पेयजल की जांच कराने के निर्देश दिए हैं, जबकि नियमित निगरानी की जरूरत है। लेकिन जिम्मेदार अधिकारी स्कूलों में पहुंचकर यह देखने की जहमत नहीं उठाते कि बच्चे किस स्रोत का पानी पी रहे हैं और उसकी गुणवत्ता क्या है। जब तक कोई घटना या शिकायत सामने नहीं आती, तब तक व्यवस्था में हलचल नहीं होती।
सैंपल की जांच हुई, लेकिन किस पानी की—पता नहीं
शिक्षा विभाग की ओर से दावा किया गया कि हाई और हायर सेकंडरी स्कूलों के जलस्रोतों की जांच कराई जा चुकी है। लेकिन जांच की प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं। स्कूलों ने अपने खर्च पर पानी के नमूने लेकर पीएचई विभाग में जमा किए। अधिकारियों ने यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था नहीं बनाई कि नमूने संबंधित स्कूल के वास्तविक पेयजल स्रोत से ही लिए गए हैं। जानकारों का कहना है कि यदि विभाग वास्तव में बच्चों को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने को लेकर गंभीर होता, तो प्रत्येक स्कूल से नमूने अधिकारी की निगरानी में लिए जाते। जांच रिपोर्ट के साथ जलस्रोत की पहचान और उसकी स्थिति का रिकॉर्ड भी रखा जाता। लेकिन यहां जिम्मेदारी स्कूलों पर डालकर विभाग ने अपनी जवाबदेही पूरी मान ली।
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