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‘आमि बांग्ला बोलते पारी…’, कितनी भाषाओं की महारथी हैं स्मृति ईरानी? पश्चिम बंगाल के प्रचार में काट रही ‘गदर’

April 20, 2026

नई दिल्ली: राजनीति में सिर्फ मुद्दे ही नहीं, बल्कि संवाद की ताकत भी बहुत मायने रखती है. और जब बात संवाद की हो, तो स्मृति ईरानी का नाम अपने आप सामने आ जाता है. टीवी इंडस्ट्री से राजनीति तक का सफर तय करने वाली स्मृति ईरानी आज एक मजबूत और प्रभावशाली नेता के रूप में जानी जाती हैं. इन दिनों उनका चुनावी अभियान दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल तक तेजी से चल रहा है. हर सभा में उनकी ऊर्जा, आत्मविश्वास और भाषा पर पकड़ लोगों को आकर्षित कर रही है. खास बात यह है कि वह सिर्फ भाषण नहीं देतीं, बल्कि लोगों की भाषा में उनसे जुड़ने की कोशिश करती हैं. यही वजह है कि उनकी रैलियां भीड़ खींचने में सफल रहती हैं और उनका संदेश सीधे जनता तक पहुंचता है.

हाल के कोलकाता रोडशो में जब उन्होंने रिपोर्टर के सवाल का जवाब देते हुए अचानक बंगाली में बोलना शुरू किया तो पूरा माहौल गरमा गया. “आमि बांग्ला बोलते पारी, बांग्ला आमार मायेर भाषा” – ये लाइन उन्होंने इतने सहज और भावपूर्ण अंदाज में कही कि मीडिया और भीड़ दोनों हैरान रह गए. लोग कहने लगे कि ये तो भाषा नहीं, दिल से जुड़ाव है.

झाउतला इलाके में रोडशो के दौरान स्मृति ईरानी ने बंगाली में धाराप्रवाह बात करके विपक्ष को पूरी तरह बेबस कर दिया. उन्होंने कहा, “आमरा बांग्लार संतान, बांग्ला आमादेर अस्मिता”. टीएमसी वाले उन्हें बाहरिया बताते हैं, लेकिन बंगाली बोलते देख भीड़ तालियों से गूंज उठी. असल में उनकी मां शिबानी बंगाली हैं, इसलिए यह भाषा उनके खून में रची-बसी है. बचपन से घर में बंगाली सुनती आईं और आज प्रचार के मैदान में इसका खूब फायदा उठा रही हैं. वे सिर्फ शब्द नहीं बोलतीं, बंगाल की मिट्टी, संस्कृति और अस्मिता का पूरा सम्मान भी जताती हैं. यही वजह है कि उनका कनेक्ट वहां के लोगों से सीधा और गहरा हो जाता है, जबकि विरोधियों के पास कोई जवाब नहीं बचता.


  • दिल्ली में स्मृति ईरानी का स्टाइल बिल्कुल अलग और आक्रामक है. यहां वे हिंदी के साथ पंजाबी मिक्स करके बोलती हैं. पिता अजय मल्होत्रा के पंजाबी-मराठी बैकग्राउंड की वजह से यह भाषा उनके लिए बिल्कुल सहज है. वे अक्सर कहती हैं, “पंजाबी मेरे पिता का हिस्सा है, इसे भूलना नामुमकिन है”. दिल्ली की रैलियों में युवाओं को आकर्षित करने के लिए अंग्रेजी भी घोल देती हैं, लेकिन हर मुद्दे को स्थानीय भाषा में ही रखती हैं. दिल्ली से बंगाल तक का यह सफर सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि जुबान पर ऐसी पकड़ का शानदार प्रदर्शन है कि जहां जाती हैं, काट रही गदर. लोग महसूस करते हैं कि कोई नेता नहीं, परिवार की सदस्य आई है.

    स्मृति ईरानी का परिवार ही उनका सबसे बड़ा भाषाई गुरुकुल रहा है. मां बंगाली, पिता आधे पंजाबी और आधे मराठी. घर में बचपन से कई भाषाएं एक साथ गूंजती थीं. टीवी एक्ट्रेस के दिनों में भी उन्होंने इन भाषाओं को संभालकर रखा. गुजरात प्रचार के दौरान गुजराती भी सीख ली और आज उसमें भी धड़ल्ले से बोलती हैं. वे खुद कहती हैं कि भारत की बहुभाषी संस्कृति हमारी सबसे बड़ी ताकत है. जब विपक्ष भाषा का विवाद खड़ा करता है तो स्मृति साफ जवाब देती हैं – “इस देश में हजारों बोलियां और सैकड़ों भाषाएं हैं, मैं सबका सम्मान करती हूं. भाषा जोड़ती है, बांटती नहीं”. यही विरासत आज उनके प्रचार को अलग रंग दे रही है.

    गुजरात की रैलियों में स्मृति “केम छो?” से शुरू करके पूरा भाषण गुजराती में कर देती हैं. मराठी में भी इतनी सहज हैं कि महाराष्ट्र के लोग उन्हें अपनी बेटी जैसा मानते हैं. एक कार्यक्रम में उन्होंने गुजराती और बंगाली दोनों भाषाओं में एक साथ बात की तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा था. यह कमाल सिर्फ रट्टा मारने का नहीं, परिवार से मिले संस्कार और दिल से जुड़ाव का है. प्रचार के दौरान वे हर भाषा में महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे साफ-साफ रखती हैं. भाषा उनके लिए सिर्फ माध्यम नहीं, भावनाओं का मजबूत हथियार है.

    आज के चुनावी मैदान में भाषा सबसे ताकतवर ब्रिज बन गई है. स्मृति ईरानी इसे बखूबी समझती हैं. जहां कई नेता एक-दो भाषाओं तक सीमित रह जाते हैं, वहां वे हर जगह लोकल भाषा बोलकर तुरंत कनेक्ट बना लेती हैं. बंगाल में बंगाली, दिल्ली में हिंदी-पंजाबी, गुजरात में गुजराती – यह स्टाइल उन्हें बाकियों से अलग बनाता है. सोशल मीडिया पर उनके बंगाली वाले वीडियो लाखों बार देखे जा रहे हैं. लोग कहते हैं कि जब नेता हमारी भाषा में बोलती है तो हमारी समस्याएं भी बेहतर समझेगी. यही वजह है कि दिल्ली से बंगाल तक उनका प्रचार काट रहा गदर.

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