
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी कोर्ट किसी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। यह टिप्पणी उस समय आई जब 15 साल की एक बच्ची, जो सात महीने से अधिक समय से गर्भवती थी ने मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति मांगी। न्यायाधीश बीवी नागरत्ना और उज्जल भूयान की बेंच ने इस मामले को बेहद संवेदनशील नजरिये से देखते हुए कहा कि गर्भवती महिला की इच्छा और उसका निर्णय सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, न कि उस बच्चे का जिसे अभी जन्म लेना है।
संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन होगा। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को अपनी जिंदगी और निजी स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है, जिसमें अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने जोर देकर कहा कि यह अधिकार खासकर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब मामला नाबालिग और अनचाही गर्भावस्था से जुड़ा हो।
अनचाही गर्भावस्था थोपना मानसिक विनाश का कारण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी बताया कि ऐसी परिस्थितियों में गर्भावस्था जारी रखना नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई, सामाजिक स्थिति और उसके पूरे भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
अदालत ने कहा कि किसी को यह कहना आसान होता है कि अगर महिला बच्चा नहीं पालना चाहती तो उसे गोद दे सकती है, लेकिन यह तर्क पूरी तरह से असंवेदनशील और अव्यवहारिक है। अनचाहे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना, महिला के हितों को नजरअंदाज करना है और उसके जीवन को दूसरे दर्जे पर रखना है।
अदालत ने चेतावनी भी दी कि अगर कोर्ट ऐसे मामलों में राहत देने से इनकार करेगा, तो लोग मजबूर होकर गैरकानूनी और खतरनाक तरीकों का सहारा लेंगे, जिससे महिलाओं की जिंदगी और ज्यादा खतरे में पड़ जाएगी। इस मामले में यह भी सामने आया कि 15 साल की इस बच्ची ने दो बार अपनी जिंदगी खत्म करने की कोशिश की थी, जो यह दिखाता है कि वह किस मानसिक दबाव से गुजर रही थी।
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