
कोलकाता। कांग्रेस (Congress) के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी (Senior leader Adhir Ranjan Chowdhury) ने बुधवार को ममता बनर्जी पर तगड़ा हमला बोला। उन्होंने कहाकि टीएमसी प्रमुख ‘अपनी करनी का फल भुगत रहीं’ हैं। उन्होंने बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) (Trinamool Congress -TMC) में जारी उथल-पुथल की तुलना 2016 विधानसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस में हुए दल-बदल से की, जिसकी वजह से पार्टी कमजोर हो गई थी। प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के पूर्व प्रमुख ने इस मौके पर साधारण टीएमसी कार्यकर्ताओं से कहाकि उन लोगों के लिए कांग्रेस के दरवाजे खुले हैं, जिन्होंने पूरी श्रद्धा से टीएमसी के लिए काम करते हुए राजनीतिक उत्पीड़न का सामना किया।
2016 में क्या हुआ था
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद लेकर बढ़ते संकट के बीच संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए चौधरी ने कहाकि इतिहास खुद को दोहराता है। टीएमसी में विद्रोह ने बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ ले लिया, जब 58 बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक ऋताब्रता बनर्जी को विधायक दल का नेता बनाने का समर्थन किया। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने भी विद्रोही गुट को सदन में आधिकारिक मुख्य विपक्ष के रूप में मान्यता दे दी। चौधरी ने आरोप लगाया कि 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद, जब कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। तब टीएमसी नेताओं ने कांग्रेस नेताओं-कार्यकर्ताओं का दल-बदल कराने के लिए धमकियों और प्रलोभनों का सहारा लिया और विधायी तौर-तरीकों व विधानसभा के नियमों की परवाह किए बिना पार्टी को खत्म करने की कोशिश की।
बदल गई हैं भूमिकाएं
चौधरी ने कहाकि आज, इतिहास के एक अलग मोड़ पर, टीएमसी ताश के पत्तों की तरह ढहने की कगार पर खड़ी है। चौधरी ने बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहाकि पूर्व मुख्यमंत्री एक समय राजनीतिक दल-बदल के खेल की अंपायर और रेफरी मानी जाती थीं, लेकिन अब यह भूमिका भाजपा ने ले ली। उन्होंने कहाकि भूमिकाएं बदल गई हैं, लेकिन दल-बदल का खेल जारी है। अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार, 2016 विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के 44 विधायकों में से लगभग 18 अंततः बंगाल की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी में शामिल हो गए थे, जिसके कारण विधानसभा में कांग्रेस सदस्यों की संख्या कम होती गई। चौधरी ने कहाकि जो खेल ममता बनर्जी ने शुरू किया और महारत हासिल की, उसमें भाजपा ने उन्हें मात दे दी।
टीएमसी में आंतरिक संकट
गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस को बुधवार को अपने 28 साल के इतिहास में पहली फूट का सामना करना पड़ा। पार्टी के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता ऋताब्रता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुनकर विधायक दल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके साथ ही उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता भी प्राप्त कर ली, जिससे ममता बनर्जी की पार्टी अपने गठन के बाद से अब तक के सबसे गंभीर आंतरिक संकट में घिर गई है। कुछ ही घंटों के भीतर, घबराए हुए तृणमूल नेतृत्व ने पूरे पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी समितियों और अग्रिम मोर्चों को भंग कर दिया। यह कदम तेजी से बढ़ते सत्ता संघर्ष के बीच राजनीतिक नियंत्रण वापस पाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
मान्यता कर लेंगे हासिल
विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के दो महीने के भीतर ही हुई इस नाटकीय बगावत ने संगठन और इसके निर्वाचित विधायकों के बीच एक गहरी दरार को उजागर कर दिया है। इसने नेतृत्व, उत्तराधिकार और उस पार्टी की भविष्य की दिशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका एक दशक से अधिक समय से बंगाल की राजनीति पर दबदबा रहा है। ऋताब्रता और उनके साथी एवं निष्कासित विधायक संदीपन साहा के नेतृत्व वाले विद्रोही खेमे ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे। यह संख्या दल-बदल रोधी कानून के तहत एक अलग गुट के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत की सीमा को आसानी से पार कर लेती है।
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