नई दिल्ली। कांग्रेस (AIC) एक बार फिर अपने चुनावी प्रबंधन (Election Management) को लेकर सवालों के घेरे में है। एक ही दिन हुए अलग-अलग चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन पूरी तरह विपरीत नजर आया। जहां कर्नाटक में कांग्रेस ने उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हुए अतिरिक्त वोट हासिल किए, वहीं झारखंड और मध्य प्रदेश में उसे ऐसे झटके लगे, जिन्होंने संगठनात्मक क्षमता और रणनीतिक कौशल पर सवाल खड़े कर दिए।
संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राजनीतिक हलचल तेज है। विपक्ष भाजपा पर दल-बदल और राजनीतिक जोड़तोड़ के जरिए अपनी ताकत बढ़ाने के आरोप लगा रहा है। इसी बीच कांग्रेस खुद भी अपने चुनावी प्रबंधन को लेकर असहज स्थिति में आ गई है।
झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार ने पार्टी नेतृत्व को झटका दिया। जीत के लिए पर्याप्त समर्थन होने के बावजूद कांग्रेस सीट नहीं बचा सकी। चुनाव की निगरानी के लिए पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं भूपेश बघेल और अजय शर्मा को जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक चुनावी तैयारियों और समन्वय में कमी रह गई।
बताया जा रहा है कि भूपेश बघेल सीमित समय के लिए ही रांची में रहे और चुनावी रणनीति के निर्णायक चरणों में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सके। वहीं अजय शर्मा पहले भी हरियाणा राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा रहे थे, जहां पार्टी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा था।
पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि आरजेडी और सीपीआई (एमएल) के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की, जिससे कांग्रेस उम्मीदवार को नुकसान हुआ। कुछ नेताओं का मानना है कि बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौरान आरजेडी उम्मीदवार की हार का असर झारखंड में दिखाई दिया।
कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि अगर शीर्ष नेतृत्व समय रहते सहयोगी दलों की नाराजगी दूर करता तो नतीजे अलग हो सकते थे। इसके अलावा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी से मुलाकात को भी गलत राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात ने कुछ विधायकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की।
झारखंड के उलट कर्नाटक में कांग्रेस ने शानदार चुनावी प्रबंधन का प्रदर्शन किया। विधान परिषद चुनाव में पार्टी के सभी पांच उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। दिलचस्प बात यह रही कि 135 विधायकों वाली कांग्रेस को कुल 151 वोट मिले, यानी उसे विपक्षी खेमे से भी समर्थन प्राप्त हुआ।
वहीं भाजपा और जेडी(एस) को अपेक्षा से कम वोट मिले, जिससे बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग के संकेत मिले। कर्नाटक कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि उन्होंने विपक्षी दलों के भीतर मौजूद असंतोष को भांपकर प्रभावी रणनीति बनाई और उसका लाभ उठाया।
कांग्रेस नेता बी.के. हरिप्रसाद ने कहा कि पार्टी ने चुनाव को संयोग पर नहीं छोड़ा बल्कि हर राजनीतिक समीकरण का गहन विश्लेषण किया। उनका कहना है कि अप्रत्यक्ष चुनावों में केवल संख्या नहीं, बल्कि प्रभावी राजनीतिक प्रबंधन जीत तय करता है।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस को एक अलग तरह की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। पार्टी नेता मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन तकनीकी खामियों के कारण खारिज हो गया। रिटर्निंग ऑफिसर ने हलफनामे को अधूरा बताते हुए उनके दस्तावेज अस्वीकार कर दिए।
राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने से कांग्रेस नेतृत्व असहज हो गया। पार्टी के भीतर इस बात पर बहस छिड़ गई है कि यह साधारण लापरवाही थी या फिर उम्मीदवार चयन से नाराज नेताओं की अंदरूनी राजनीति का नतीजा।
कर्नाटक की सफलता और झारखंड-मध्य प्रदेश की विफलता ने कांग्रेस के भीतर मौजूद विरोधाभास को उजागर कर दिया है। एक ओर पार्टी कुछ राज्यों में बेहतर राजनीतिक प्रबंधन का उदाहरण पेश कर रही है, तो दूसरी ओर गठबंधन समन्वय, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति में कमियां सामने आ रही हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस 2027 और 2029 के बड़े चुनावी मुकाबलों में विपक्ष की केंद्रीय ताकत बनना चाहती है, तो उसे अपने संगठन, सहयोगी दलों और चुनावी गणित को अधिक प्रभावी ढंग से साधना होगा। फिलहाल कर्नाटक की जीत से ज्यादा चर्चा झारखंड और मध्य प्रदेश की चूकों की हो रही है।
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