रांची। कभी जहां 22 घोड़ों का अस्तबल हुआ करता था, आज वहीं बच्चों की पढ़ाई के लिए स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर लैब (computer lab) और आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। रांची का यह ऐतिहासिक विद्यालय (Historic school) करीब डेढ़ सदी से शिक्षा की अलख जगा रहा है। इसकी शुरुआत सैनिकों और अर्धसैनिक बलों के बच्चों को शिक्षा देने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ यह आम बच्चों के लिए भी शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
इस विद्यालय का इतिहास बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) की स्थापना से जुड़ा है। वर्ष 1880 में बीएमपी की स्थापना के समय यहां गोरखा रेजिमेंट की 10 कंपनियां तैनात थीं। जवानों के बच्चों की पढ़ाई के लिए चार खपरैल और छह पक्के कमरों में इस स्कूल की शुरुआत की गई थी। उस समय विद्यालय का कुल परिसर 2.77 एकड़ में फैला हुआ था।
परिसर में एक ‘घोड़ा लाइन’ थी, जहां 22 घोड़ों का अस्तबल बनाया गया था। वहीं ‘डिबरी लाइन’ में उन सिपाहियों के आवास थे, जो घोड़ों की देखभाल किया करते थे। उस दौर में स्कूल का संचालन बीएमपी के कमांडेंट की निगरानी में होता था और हर वर्ष 5 जनवरी को स्थापना दिवस के साथ स्कूल दिवस भी मनाया जाता था। बाद में वर्ष 1976 में बिहार सरकार ने इस विद्यालय का अधिग्रहण कर लिया।
विद्यालय के विकास में कई शिक्षकों और प्राचार्यों का अहम योगदान रहा। इनमें सुहैल अनवर (1985), विष्णु माया थापा (1992), सिस्टर मेरी बर्नार्ड (1995) और भगवान दास (1999) प्रमुख रहे। सिस्टर मेरी बर्नार्ड को वर्ष 1996 में राष्ट्रपति सम्मान से भी नवाजा गया था। वर्तमान में विद्यालय के प्राचार्य अशोक प्रसाद सिंह हैं, जो रांची-2 के निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी भी हैं। विद्यालय में एक प्रधानाध्यापक और नौ शिक्षिकाएं कार्यरत हैं।
शुरुआत से ही यहां सह-शिक्षा की व्यवस्था रही है। वर्ष 1985 तक विद्यालय में 1200 से 1500 छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते थे, लेकिन वर्तमान में यह संख्या घटकर लगभग 200 रह गई है। इनमें करीब 60 प्रतिशत छात्राएं और 40 प्रतिशत छात्र हैं। विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा तक शिक्षा दी जाती है।
प्रबंधन के अनुसार विद्यार्थियों की संख्या घटने का मुख्य कारण आसपास लगभग एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में 28 स्कूलों का खुलना है, जिनमें अधिकांश निजी विद्यालय हैं। यहां पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं।
इतिहास से जुड़ा होने के बावजूद विद्यालय आधुनिक संसाधनों से भी सुसज्जित है। यहां 10 कंप्यूटर, एक हजार से अधिक पुस्तकों वाली लाइब्रेरी, चार स्मार्ट क्लास, सौर ऊर्जा की व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
खेलकूद के लिए कैरम, लूडो, बैडमिंटन, क्रिकेट, फुटबॉल और वॉलीबॉल जैसी इंडोर और आउटडोर गतिविधियों की सुविधा है। परिसर में बच्चों के लिए ओपन जिम भी बनाया गया है।
विद्यालय में विद्यार्थियों को चार हाउसों में बांटा गया है, जिनके नाम झारखंड की प्रमुख नदियों कोयल, दामोदर, शंख और स्वर्णरेखा पर रखे गए हैं। प्रत्येक हाउस का अपना अलग रंग भी निर्धारित है—कोयल (लाल), दामोदर (हरा), शंख (नीला) और स्वर्णरेखा (पीला)।
विद्यालय में समय-समय पर क्विज, वाद-विवाद, निबंध लेखन, चित्रकला और योग जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। अंग्रेजी भाषा को बेहतर बनाने के लिए वोकैब थॉन और ग्रुप डिस्कशन का आयोजन होता है। वहीं ‘पढ़ो और बढ़ो’ अभियान के तहत बच्चों को झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों से परिचित कराया जाता है।
विद्यालय में प्रत्येक माह प्रोजेक्ट टीम बच्चों की शैक्षणिक प्रगति का आकलन करती है। रेगुलर असेसमेंट इम्प्रूव्ड लर्निंग (RAIL) के माध्यम से विद्यार्थियों के विकास पर लगातार नजर रखी जाती है। इसके अलावा हर छह महीने पर एसए-1 और एसए-2 के तहत योगात्मक मूल्यांकन भी किया जाता है।
विद्यालय में लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए बाल संसद का गठन किया गया है। इसमें प्रधानमंत्री, उपप्रधानमंत्री, अध्यक्ष और मंत्रिमंडल का चुनाव मतदान के जरिए कराया जाता है।
यदि कोई छात्र लगातार स्कूल नहीं आता है तो ‘सीटी बजाओ 2.0’ अभियान के तहत शिक्षक और छात्र उसके घर पहुंचकर उसे स्कूल आने के लिए प्रेरित करते हैं।
विद्यालय में विद्यार्थियों को मिड-डे मील, मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, स्टेशनरी और छात्रवृत्ति का लाभ मिलता है। पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों को स्कूल की ओर से यूनिफॉर्म दी जाती है, जबकि तीसरी से आठवीं तक के विद्यार्थियों के खातों में यूनिफॉर्म की राशि सीधे भेजी जाती है। आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को साइकिल योजना का लाभ भी मिलता है।
विद्यालय का शैक्षणिक प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा है। झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) की आठवीं बोर्ड परीक्षा में यहां के विद्यार्थियों का परिणाम लगातार शत-प्रतिशत रहा है।
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