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हैप्पी बर्थ-डे अग्रिबाण, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर, एक बुलंद आवाज का कामयाब सफर है जारी

May 23, 2026

  • ना तेवर बदले ना ही अंदाज-ए-बयां
  • गुमनाम एक लाश कफऩ को तरस गई
  • कागज़़ तमाम शहर के अख़बार बन गए

इंदौर, राजेश ज्वेल। 24 ही घंटे बुक्काफाडक़र चिल्लाने वाले न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता तो वर्षों पहले ही धराशायी हो चुकी। मगर छपे हुए कागज यानी प्रिंट मीडिया की साख कुछ अवश्य बची हुई है। इनमें एक बुलंद और दबंग आवाज अग्रिबाण की है। इंदौर की पत्रकारिता में 49 सालों से कामयाबी का परचम लहराते हुए अग्रिबाण का सफर मुसस्सल जारी है। देश के नम्बर वन हिन्दी सांध्य दैनिक का खिताब हासिल करने वाला अग्रिबाण आज भी लाखों पाठकों के भरोसे पर खरा उतरता रहा है। आज अग्रिबाण अपनी 49वीं वर्षगांठ मना रहा है। अखबारों की भीड़ में यह सफर नि:संदेह तारीफ-ए-काबिल तो है ही, वहीं उस बुलंदी पर बने रहने की जद्दोजहद और जनहित में खबरों के साथ खरी-खरी लिखने को प्रतिबद्ध भी है। दोपहर के जैसे ही 12 बजते हैं, शहर के कोने-कोने में अग्रिबाण की तलब पाठकों को अलगने लगती है। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर की नीति पर अमल करते हुए अग्रिबाण ने खबरों से समझौता नहीं किया, चाहे सामने वाला कितना ही रसूखदार क्यों ना हो। 49 सालों से जो विश्वसनीयता कायम रखी, उसमें कभी कोई दबाव-प्रभाव काम नहीं आया। यही कारण है कि आज भी सुबह के अखबारों के लिए अग्रिबाण गैस पेपर की तरह है और उसी की खबरोंको कई बार तो बड़े सुबह के अखबार अपनी एक्सक्लूसिव खबर के रूप में प्रकाशित करते हैं।

छोटे-बड़े घटनाक्रम से लेकर खोजी खबरों और विकास से जुड़े तमाम प्रोजेक्टों को भी अग्रिबाण उसी शिद्दत से प्रकाशित करता है। यही कारण है कि इतना लम्बा सफर तय करने के बाद भी अग्रिबाण के ना तो तेवर बदले और ना ही अंदाज-ए-बयां। यह बात अलग है कि हुकुमतें बदलती रही हूं, मगर सच कहने और लिखने का जज्बा अभी भी कायम है। यह बात अलग है कि आज की दुनिया मोबाइल पर सिमट गई है और 24 ही घंटे दुनियाभर की जानकारी व्हाट्सअप सहित सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म के जरिए जनता तक पहुंचती है। मगर उसमें एक बड़ा हिस्सा फेक न्यूज का भी रहता है। राजनीतिक दलों ने भी अपने आईटी सेल के माध्यम से असल खबरों को छुपाने और विरोधियों को बदनाम करने के लिए फर्जी खबरें और प्लांटेड स्टोरी पोस्ट की जाती है, तो दूसरी तरफ नोएडा से चलने वाले न्यूज चैनलों ने भी अनेकों अवसरों पर अपनी खिल्ली उड़वाई और पत्रकारिता की साख को धूल-धुसरित भी किया। यही कारण है कि कई लोगों ने न्यूज चैनल देखना छोड़ दिया, उनका भरोसा प्रिंट मीडिया यानी अखबारों पर अभी भी कायम है।


  • यही कारण है कि अग्रिबाण जैसा शाम का अखबार इस तरह ना सिर्फ शिखर पर पहुंचा, बल्कि 49 साल बाद भी उसने अपनी शाख और विश्वसनीयता को बरकरार रखा है। वैसे तो कई अखबार आए और चले गए और वैसे भी इंदौर अखबारों की मंडी रहा है। सुबह और शाम के अखबारों के साथ-साथ बड़ी संख्या में साप्ताहिक भी निकलते रहे हैं और अब तो व्हाट्सअप अखबारों का भी तेजी से चलन बढ़ा है, जो सनसनीखेज मगर फर्जी खबरों के बलबूते पर चंद घंटों की सुर्खियां बटोर लेते हों, मगर झूठ की इस बेसाखी पर कोई सफर तय नहीं कर पाते और कुछ ही समय में अंधेरे में खो जाते हैं। मगर पाठकों की तलब-भूख और सच्ची खबरों को पढऩे की आदत अग्रिबाण ने ही विकसित की है। यही कारण है कि खबरों की भेडिय़ा घसान और अखबारों की भीड़ के बावजूद आज भी अखबार में छपी खबरों पर शासन-प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों को भरोसा रहता है। इंदौर का कोई घटनाक्रम ऐसा नहीं है जो अग्रिबाण की खबरों से अछूता हो। कोई भी पॉलिसी, महत्वपूर्ण फैसले पर सुझाव देना हो तो उसमें भी अग्रिबाण की भूमिका अग्रणी रहती है। 49 साल की नाबाद पारी में अनगिनत चौकों-छक्कों को लगाते हुए शाम का यह लाड़ला अखबार धूमधाम से 50वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हम प्रतिबद्ध हैं, भरोसा भी दिलाते हैं कि खबरों और विचारों के साथ कभी समझौता नहीं होगा।

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