इंदौर

कोरोना प्रबंधन के नाम पर गोले बनाते इंदौरी नेता


वार्ड स्तर पर बनी कमेटियां भी बोगस साबित… कोरोना से ज्यादा जनता और कारोबारियों से लड़ते रहे शासन-प्रशासन
इंदौर, राजेश ज्वेल।  14 महीने कोरोना से जूझते हुए जनता और कारोबारियों को हो गए हैं। दूसरी तरफ इंदौरी नेता या तो फीते काटने में या सडक़ों पर निकलकर गोले बनाने जैसी नौटंकियों में ही व्यस्त अधिक रहे। वैज्ञानिक तरीके से कोरोना प्रबंधन किस तरह किया जाए इसकी समझ जनप्रतिनिधियों से लेकर शासन-प्रशासन में बैठे जिम्मेदारों को अभी तक नहीं आई है। सिर्फ लॉकडाउन और उसके नाम पर डंडे चलाने की सख्ती से ही कोरोना पर काबू पाने का तरीका खोजा गया है, जो कि अस्थायी ही साबित हुआ है। वैक्सीनेशन से लेकर कोरोना प्रोटोकॉल को किस तरह से व्यवस्थित रूप से लागू करवाया जाए इसकी समझ नेताओं से लेकर जनता तक कारगर तरीके से नहीं पहुंचाई जा सकी है। वार्ड स्तर पर जो कमेटियां बनी वे भी बोगस ही साबित हुई है।
दुनियाभर में जहां कोरोना से चिकित्सकीय और वैज्ञानिक तरीके से निपटा जा रहा है, वहीं पूरे देश में कोरोना प्रबंधन के नाम पर जनता और कारोबारियों के साथ संघर्ष ही अधिक नजर आया। किस तरह जनता को घरों में कैद किया जाए और सडक़ पर छोटा-मोटा कारोबार करने वालों से लेकर शॉपिंग मॉल और अन्य प्रतिष्ठान ज्यादा से ज्यादा समय तक बंद रखे जाएं, इसी पर ज्यादा जोर रहा है। कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करवाते हुए किस तरह सामाजिक, धार्मिक या व्यवसायिक गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं, इसकी व्यवहारिक समझ का लगातार अभाव देखा गया है। कोरोना की पहली लहर की बागडोर केन्द्र ने संभाली, तो दूसरी लहर जब बेकाबू हुई और केन्द्र की आलोचना होने लगी तो सारा बोझा राज्यों के माथे डाल दिया गया। मध्यप्रदेश में तो जनभागीदारी से कोरोना पर जंग पाने का नायाब फार्मूला खोजा गया, जिसमें मंत्रियों से लेकर वार्ड पार्षदों तक की हजारों कमेटियां बना दी, जो सिर्फ झांकी-मंडप और मीडिया के बयानों तक ही सीमित रही। वैक्सीनेशन सेंटरों पर भी नेताओं के पोस्टर लगे हैं, तो दुकानें खुलवाने के लिए भी उनके चक्कर काटना पड़ रहे हैं। पहले तो चुनाव में सारे नेता व्यस्त रहे, उसके बाद जब कोरोना माथे पर आ बैठा तो उससे निपटने की नौटंकी करते रहे। सडक़ों पर उतरकर कभी मास्क बांटने, तो कभी हाथ में माइक लेकर समझाइश देने, तो दुकानों के सामने गोले बनाते नजर आए। कोरोना के सारे कायदे-कानून शासन-प्रशासन ने जनता और कारोबारियों पर थोपे और अधिकांश मौकों पर खुद ही उसका उल्लंघन करते नजर आए। आवश्यक कार्य से निकली जनता को सडक़ों-चौराहों पर रोककर उनके वाहनों की हवा निकाल दी, तो अस्थायी जेल में भी भिजवा दिया। जबकि कई मौकों पर भीड़ लगाए जनप्रतिनिधि नजर आते हैं और किसी पर कोई कार्रवाई कोरोना प्रोटोकॉल उल्लंघन के मामले में नजर नहीं आती। शासन ने भले ही प्रभारी मंत्री से लेकर वार्ड स्तर पर कोरोना प्रबंधन कमेटियां बना दी, मगर वे भी बोगस ही साबित हुई है। शुरुआत में इन कमेटियों की बैठकें हुईं, उसके बाद अनलॉक के दौरान इनकी कोई भूमिका नहीं रही। यहां तक कि जिला कागजी क्राइसिस कमेटी भी कागजी है और सारे निर्णय शासन स्तर पर ही लिए जा रहे हैं।
व्यवसायिक राजधानी को बना रखा है बंधक
प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर को बीते 65 दिनों से बंधक बना रखा है। कोरोना की दूसरी लहर बढऩे पर लॉकडाउन और सख्ती जरूरी थी, मगर अब यह समझ के परे है, जब संक्रमण दर सवा फीसदी से भी नीचे आ गई है और सौ-सवा सौ मरीज भी रोजाना नहीं मिल रहे हैं। इंदौर ही सबसे अधिक कर देता है। बावजूद इसके जनप्रतिनिधियों और भोपाल में बैठे जिम्मेदारों ने इंदौर को बंधक बना रखा है।
मुख्यमंत्री भी केन्द्र की नीतियों पर बोल नहीं पाते
मप्र की एक दिक्कत यह है कि केन्द्र में सरकार भी भाजपा की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोरोना से संबंधित जो दिशा-निर्देश भिजवाते हैं उसका अक्षरस: पालन करना मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की राष्ट्रीय मजबूरी है। उनकी हिम्मत ही नहीं कि वे कुछ बोल सकें। जबकि अन्य राज्यों के विपक्ष के मुख्यमंत्री तो फिर भी अपना मुंह खोल लेते हैं, मगर शिवराज जी की तो हिम्मत नहीं कि वे कुछ बोल पाएं।
लॉकडाउन से दुनिया में कहीं भी खत्म नहीं हुआ कोरोना
दुनियाभर में लॉकडाउन से कोरोना कहीं भी खत्म नहीं हुआ है। सिर्फ कुछ समय तक संक्रमण को रोकने, अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन, इंजेक्शन या अन्य सुविधाओं को जुटाने के वक्त की ही जुगाड़ की गई। इंदौर में भी यही हुआ। जब सारे अस्पताल भर गए तो लॉकडाउन लगाना जरूरी था, मगर अब जबकि 80 से 90 फीसदी अस्पताल खाली हैं और गिनती के मरीज नहीं बचे तो लॉकडाउन का क्या औचित्य..?
फीते काटने की बजाय करवाते वैक्सीन की जुगाड़
जनप्रतिनिधि किसी एम्बुलेंस, तो किसी कोविड सेंटर या ऑक्सीजन प्लांट से लेकर वैक्सीनेशन सेंटर के फीते काटते और भीड़ जुटाते नजर आते हैं। इसकी बजाय अगर सरकार से लड़-भिडक़र ज्चादा वैक्सीन उपलब्ध करवाते तो जनता और कारोबारियों का फायदा होता और जल्द से जल्द अधिक से अधिक आबादी को वैक्सीन लग पाती। मगर सत्ता पक्ष से जुड़े इंदौरी नेता इस पर कुछ नहीं बोल पाते।

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