बीजिंग। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) इन दिनों राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के साथ चीन (China Visist) दौरे पर हैं, लेकिन उनकी यात्रा से ज्यादा चर्चा उस तरीके की हो रही है जिसके जरिए वह चीन में दाखिल हो सके। रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन में प्रतिबंध झेल रहे रुबियो ने कूटनीतिक रास्ता अपनाते हुए अपना नाम बदलकर ‘मार्को लू’ (Marco Lu) कर लिया, जिसके बाद उन्हें बीजिंग में प्रवेश मिला।
2020 से चीन की प्रतिबंध सूची में थे रुबियो
मीडिया रिपोर्ट्स और राजनयिक सूत्रों के मुताबिक, चीन ने वर्ष 2020 में मार्को रुबियो पर प्रतिबंध लगाया था। यह कार्रवाई उस समय हुई थी जब वह अमेरिकी सीनेटर के रूप में चीन की नीतियों के खिलाफ लगातार आक्रामक बयान दे रहे थे। बताया जा रहा है कि चीन की प्रतिबंध सूची में उनका नाम अंग्रेजी स्पेलिंग “Rubio” के आधार पर दर्ज था। ऐसे में उनके सरनेम को बदलकर “Lu” किए जाने के बाद तकनीकी रूप से प्रवेश की राह आसान हो गई।
उइगर मुद्दे पर चीन से टकराव
मार्को रुबियो लंबे समय से चीन के मुखर आलोचक माने जाते हैं। उन्होंने कई बार चीन पर शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए थे।
रुबियो ने दावा किया था कि चीन लाखों उइगरों को हिरासत शिविरों में रखकर उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान खत्म करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने जबरन मजदूरी, महिलाओं के साथ हिंसा, नसबंदी और दमन जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे। चीन ने हमेशा इन आरोपों को खारिज किया है और इन्हें पश्चिमी देशों का राजनीतिक प्रचार बताया है।
ट्रंप-शी मुलाकात पर दुनिया की नजर
साल 2024 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद यह Donald Trump का पहला चीन दौरा है। ट्रंप बुधवार को अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ बीजिंग पहुंचे। गुरुवार को उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से बीजिंग स्थित ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में होनी है।
दोनों नेताओं के बीच व्यापार, वैश्विक तनाव, रणनीतिक साझेदारी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। हालांकि, ट्रंप ने साफ किया है कि वह ईरान युद्ध से जुड़े हालात पर शी जिनपिंग से कोई विशेष चर्चा नहीं करेंगे, जबकि चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार माना जाता है।
कूटनीति या तकनीकी रास्ता?
मार्को रुबियो का ‘मार्को लू’ बनकर चीन पहुंचना अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। इसे कुछ विशेषज्ञ कूटनीतिक लचीलापन बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे प्रतिबंधों को दरकिनार करने की रणनीति मान रहे हैं। फिलहाल, व्हाइट हाउस की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
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