ब्‍लॉगर

एमएसपी घोषणा से दलहन-तिलहन में बढ़ेगी आत्मनिर्भरता

– डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

केन्द्र सरकार की खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा से दलहन और तिलहन के उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में बढ़ता कदम माना जाना चाहिए। देश में तिलहन और दलहन का उत्पादन पिछले सालों में लगातार बढ़ता जा रहा है पर अभी भी देश दलहन और तिलहन के क्षेत्र में घरेलू जरूरत पूरी होने जितना उत्पादन हो नहीं पा रहा है। हालांकि अब धीरे-धीरे दलहन तिलहन का उत्पादन बढ़ने लगा है और केन्द्र सरकार 2027 तक दलहन के क्षेत्र में देश की विदेशी निर्यात पर पूरी निर्भरता कम होने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। केन्द्र सरकार की आगामी खरीफ के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा से यह साफ हो जाता है कि सरकार दलहन और तिलहन के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सही व योजनावद्ध तरीके से कदम बढ़ा रही है।


सरकार का लक्ष्य है कि 2027 तक दलहन के क्षेत्र में इस हद तक आत्मनिर्भर हो जाए कि विदेशों से एक दाना भी दाल का आयात नहीं करना पड़े। एक मोटे अनुमान के अनुसार दुनिया भर में कुल उत्पादित दालों अर्थात दलहनी फसलों में भारत की भागीदारी 25 प्रतिशत के लगभग है। 2027 तक यह लक्ष्य अर्जित करने के लिए हमें 28 फीसदी का आंकड़ा छूना होगा। देश के कृषि वैज्ञानिकों और किसानों के संयुक्त प्रयास से देश में कृषि उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। सरकार द्वारा भी इस दिशा में लगातार प्रयास जारी है और जिस तरह के परिणाम सामने आ रहे हैं वे निश्चित रूप से सकारात्मक और उत्साहवर्द्धक है।

न्यूनतम समर्थन मूल्यों में लगातार बढ़ोतरी और तिलहनी-दलहनी फसलों की खरीद के आश्वासन से किसानों का दलहन-तिलहन के प्रति रुझान बढ़ा है। केन्द्र सरकार ने खरीफ फसल की धान एवं ज्वार की दो किस्मों सहित 16 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा कर एक बार फिर किसानों को बड़ी राहत दी है। केन्द्र सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य के अनुसार सर्वाधिक बढ़ोतरी नाइजरसीड यानी कि राम तिल पर की गई है तो दालों में अरहर/तुअर की दाल के एमएसपी में भी 550 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। वैसे सरकार द्वारा खरीफ की सभी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय और किसानों को प्रोत्साहित करने वाली बढ़ोतरी की है।

न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा के पीछे उद्देश्य यह रहा है कि किसानों को कम से कम उनकी लागत का पूरा मूल्य मिल सके। देश में पहली बार 1966-67 में केवल गेहूं की सरकारी खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की गई थी। एक अगस्त, 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एलके झा की अध्यक्षता में इसके लिए कमेटी घटित की थी। इसके बाद सरकारों ने अन्य प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की और कदम बढ़ाए। केन्द्र सरकार द्वारा सीएसीपी यानी कि कृषि मूल्य एवं लागत आयोग की सिफारिश पर कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाने लगी। आज देश में 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है। इसमें 7 गेहूं, धान आदि अनाज फसलें, 5 दलहनी फसलें, 7 तिलहनी फसलों 4 नकदी फसलों के समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है।

नकदी फसलों में गन्ना के सरकारी खरीद मूल्य की सिफारिश गन्ना आयोग द्वारा की जाती है तो गन्ने की खरीद भी सीधे गन्ना मिलों द्वारा की जाती है। इसी तरह से कपास की खरीद सीसीआई यानी कि कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा की जाती है। मुख्यतौर से अनाज की खरीद भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से और दलहन व तिलहन की खरीद नेफैड द्वारा राज्यों की सहकारी संस्थाओं और अन्य खरीद केन्द्रों के माध्यम से की जाती है। केरल सरकार ने 16 तरह की सब्जियों के बेस मूल्य तय कर सब्जी उत्पादक किसानों को बड़ी राहत देने की पहल की है तो हरियाणा सरकार भी केरल की तरह हरियाणा सरकार भी सब्जियों का बेस मूल्य तय करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। किसानों के लिए सर्वाधिक चर्चित एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने को लेकर भी प्रमुखता से जोर दिया जाता रहा है।

एमएस स्वामीनाथन आयोग ने 2004 में अपनी सिफारिश में न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने का एक फार्मूला सुझाया था कि उत्पादन लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक एमएसपी घोषित की जाए। हांलाकि सरकार का दावा है कि खरीफ 2024 के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य 2018-19 की बजट घोषणा के अनुरूप अखिल भारतीय औसत उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर तय किया गया है। सरकारी दावों की बात की जाए तो बाजरा की उत्पादन लागत पर 77 प्रतिशत तो तूअर पर 59 प्रतिशत, मक्का पर 54 प्रतिशत, उड़द पर 52 प्रतिशत तो बाकी अन्य फसलों पर भी उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत मार्जिन होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

दरअसल देश में तिलहन और दलहन उत्पादन के लिए सरकारें गंभीर रही हैं। 1986 में सैम पित्रोदा की अध्यक्षता में टीएमओ यानी कि तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन का गठन किया गया था। इस मिशन के माध्यम से देश में तिलहनों के उत्पादन को बढ़ाना था। राजस्थान सहित देश के प्रमुख उत्पादक राज्यों में तिलहन उत्पादन बढ़ाने के समन्वित प्रयास किए गए। राजस्थान में तो सहकारी क्षेत्र में तेल मिलें भी लगाई गई और तिलहन सोसाइटियां गठित कर उनका संघ भी बनाया गया।

तेल मिलों का संचालन भी इसी संघ को दिया गया पर कालांतर में तिलम संघ की तेल मिलें तो बंद हो गईं वहीं तिलम संघ अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आज भी जूझ रहा है। कमोबेश यही स्थिति अन्य प्रदेशों में भी रही है। खैर यह विषयांतर हो गया पर 1990 में दलहन को भी इस तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन के दायरे में लाया गया। इसके बाद 1992-93 और 95-96 में पाम ऑयल और मक्का को भी इस तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन के दायरे में लाकर इनके उत्पादन को बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। 2021 से मिशन पॉम ऑयल भी सकारात्मक दिशा में बढ़ता कदम माना जा सकता है। इसके माध्यम से सरकार ने 15 राज्यों में पॉम ऑयल के उत्पादन को बढ़ावा देने के प्रयास किए।

इस मिशन के तहत 2025-26 में पूर्वोत्तर राज्यों में 3.28 लाख हैक्टेयर में और पूर्वोत्तर के इतर राज्यों में 3.22 लाख हैक्टेयर में पॉम ऑयल की खेती का रकबा पहुंचाने का लक्ष्य रख कर सरकार चल रही है। खैर दो बातें साफ हो जानी चाहिए कि देश को तिलहन और दलहन की पैदावार में बढ़ोतरी कर आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाना और समयपूर्व एमएसपी घोषित करना सही दिशा में बढ़ता प्रयास है तो दूसरी और न्यूनतम घोषित दर किसानों को मिले ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है। इसके लिए खरीद व्यवस्था को चाक-चौबंद और खरीद तंत्र को मजबूत बनाना होगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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