मुंबई। महाराष्ट्र (Maharashtra) में ऑटो और टैक्सी चालकों (Auto and Taxi Drivers) के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करने के प्रस्ताव ने सियासी बहस को तेज कर दिया है। प्रताप सरनाईक (Pratap Sarnaik) के बयान के बाद जहां सरकार बैकफुट पर आती दिखी और 100 दिनों का अभियान चलाने का फैसला किया, वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं ने इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
राज्य सरकार ने 1 मई से लाइसेंसधारी ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलना, पढ़ना और लिखना अनिवार्य करने की बात कही थी। हालांकि विरोध बढ़ने पर अब इसे फिलहाल टालते हुए “कामचलाऊ मराठी” सीखने के लिए 100 दिन की मोहलत देने का फैसला किया गया है। सरकार का तर्क है कि यह कदम स्थानीय यात्रियों की सुविधा के लिए है।
भारतीय जनता पार्टी के नेता गुरू प्रकाश ने कहा कि क्षेत्रीय पहचान का सम्मान जरूरी है, लेकिन देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी काम करने का समान अधिकार होना चाहिए।
वहीं जनता दलl (United) के प्रवक्ता रवि रंजन प्रसाद ने सुझाव दिया कि गैर-मराठी लोगों को भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
निशाद पार्टी के संजय निशाद ने इसे सामाजिक सद्भाव के खिलाफ बताते हुए प्रशिक्षण की व्यवस्था पर जोर दिया।
राष्ट्रीय जनता दल के मनोज झा ने इस फैसले को “तानाशाही” करार दिया।
समाजवादी पार्टी के नेता Mata Prasad Pandey ने कहा कि महाराष्ट्र में काम कर रहे लाखों प्रवासी मजदूरों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
कांग्रेस ने भी इसे संघीय ढांचे और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
आंकड़ों के मुताबिक, देश के कुल वर्कफोर्स का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश और बिहार से आता है। मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई शहरों में ऑटो-टैक्सी चलाने वाले चालकों में इन राज्यों के लोगों की संख्या काफी ज्यादा है। ऐसे में भाषा की अनिवार्यता उनके रोजगार पर असर डाल सकती है।
महाराष्ट्र में ‘मराठी बनाम प्रवासी’ की राजनीति नई नहीं है। शिवसेना और Maharashtra Navnirman Sena (मनसे) जैसे दल लंबे समय से इसे मुद्दा बनाते रहे हैं। मौजूदा फैसला भी उसी बहस को फिर से हवा देता दिख रहा है।
भारतीय संविधान का Article 19(1)(g) of the Constitution of India नागरिकों को देश में कहीं भी व्यवसाय या रोजगार करने की आजादी देता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा के आधार पर पाबंदी इस अधिकार से टकरा सकती है।
कुल मिलाकर, महाराष्ट्र सरकार का यह कदम अब केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भाषा, रोजगार और अधिकारों की बहस का मुद्दा बन गया है।
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