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‘प्राइवेट पार्ट’ और ‘एग्जाम पेपर’ में फर्क.. पेपर लीक केस में कोर्ट ने पुलिस को क्यों दी नसीहत?

June 26, 2026

नई दिल्ली । गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने एक दिलचस्प मामले की सुनवाई करते हुए इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट के तहत लगे प्राइवेसी उल्लंघन के आरोप खारिज कर दिए हैं. मामला गुजरात लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की परीक्षा से जुड़ा है. एक कैंडिडेट पर पेपर की फोटो खींचकर WhatsApp पर भेजने का आरोप था. पुलिस ने कैंडिडेट के खिलाफ प्राइवेसी के उल्लंघन की धारा लगा दी थी. लेकिन कोर्ट ने कहा कि पेपर की फोटो खींचना और उसे किसी को भेजना इस कानून के दायरे में नहीं आता है.

जस्टिस पी एम रावल की सिंगल बेंच ने 16 जून को हार्दिक पुरोहित और राहुल पुरोहित नाम के दो भाइयों की याचिका पर यह अहम आदेश सुनाया. इन दोनों भाइयों ने साल 2018 में अपने खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर को रद्द करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हाईकोर्ट ने न सिर्फ आईटी एक्ट की धारा हटाई, बल्कि सरकारी आदेश की अवहेलना करने वाली धारा भी खारिज कर दी. हालांकि, कोर्ट ने पुलिस को दूसरे मामलों में जांच जारी रखने की छूट दी है.



  • क्या था मामला और पुलिस ने कौन सी धाराएं लगाई थीं?
    यह विवाद 2018 का है. FIR के मुताबिक, जीपीएससी (GPSC) परीक्षा के दौरान कैंडिडेट हार्दिक पुरोहित ने चालाकी से एग्जाम हॉल के अंदर क्वेश्चन पेपर की फोटो खींच ली. इसके बाद उसने ये तस्वीरें अपने भाई राहुल पुरोहित को WhatsApp पर भेज दीं. मामला खुला तो पुलिस ने दोनों भाइयों के खिलाफ आपराधिक साजिश (IPC 120-B), सरकारी कर्मचारी के आदेश की नाफरमानी (IPC 188) और आईटी एक्ट की धारा 66-E के तहत केस दर्ज कर लिया. इसी एफआईआर के खिलाफ दोनों भाई हाईकोर्ट पहुंचे थे.

    सुनवाई के दौरान गुजरात हाईकोर्ट ने पुलिस के जरिए लगाई गई आईटी एक्ट की धारा 66-E पर सख्त रुख अपनाया. कोर्ट ने कानून की बारीकियां समझाते हुए कहा कि यह धारा किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसके ‘प्राइवेट पार्ट्स’ (निजी अंगों) की तस्वीरें खींचने, उन्हें पब्लिश करने या ट्रांसफर करने के अपराध से निपटने के लिए बनाई गई है.
    ‘वॉट्सऐप के जरिए भाई को क्वेश्चन पेपर की फोटो भेजना, किसी व्यक्ति के प्राइवेट एरिया की फोटो खींचने या उसे वायरल करने के दायरे में नहीं आता. इसलिए इस मामले में आईटी एक्ट की धारा 66-E लागू ही नहीं होती.’ – जस्टिस पी एम रावल

    IPC 188 हटाने के पीछे कोर्ट का क्या तर्क था?
    पुलिस ने इस केस में आईपीसी की धारा 188 भी लगाई थी, जो किसी लोक सेवक के कानूनी आदेश को न मानने पर लगती है. पुलिस का तर्क था कि एग्जाम हॉल में मोबाइल ले जाना बैन था, फिर भी आरोपी मोबाइल अंदर ले गया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि GPSC के जरिए उम्मीदवारों को मोबाइल न लाने के जो निर्देश दिए जाते हैं, उन्हें सरकारी अफसर की तरफ से जारी किया गया आधिकारिक आदेश नहीं माना जा सकता. परीक्षा के नियम अलग बात हैं और कानूनन सरकारी आदेश अलग. इसलिए कोर्ट ने धारा 188 भी खारिज कर दी.

    पुलिस के पास अब क्या रास्ता बचा है?
    दोनों भाइयों को इन बड़ी धाराओं से बेशक राहत मिल गई है, लेकिन उनकी मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. गुजरात हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वो सिर्फ इन दो धाराओं (IPC 188 और IT Act 66-E) को हटा रहे हैं. अगर जांच अधिकारी को लगता है कि इस मामले में धोखाधड़ी या परीक्षा से जुड़े अन्य अपराधों के तहत कोई और कानूनी धारा बनती है तो पुलिस उस दिशा में अपनी जांच जारी रखने के लिए स्वतंत्र है.

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