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करुणा और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित है भारतीय चिकित्सा परंपरा सेवा

July 08, 2026

जबलपुर। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, महाकौशल प्रांत एवं रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में श्रीराम ग्रुप, जबलपुर में पर्यावरण संरक्षण में भारतीय ज्ञान प्रणाली की भूमिका विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ मंगलवार को हुआ। उद्घाटन सत्र में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं, शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न करना तथा वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु भारतीय चिंतन को व्यवहार में लाने के लिए प्रेरित करना है।



  • कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि आज विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन समस्याओं का स्थायी समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय जीवन दर्शन में निहित है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत अपने घर से ही होनी चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार में जल बचाने, वृक्ष लगाने, प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, स्वच्छता बनाए रखने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संकल्प ले, तो समाज में व्यापक परिवर्तन संभव है। डॉ. कोठारी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता, नदियों को देवी, वृक्षों को देवतुल्य और समस्त जीव-जगत को एक परिवार के रूप में देखा गया है। यही दृष्टि भारत को विश्व के सामने पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रभावी मॉडल प्रस्तुत करने की क्षमता प्रदान करती है। उन्होंने युवाओं से भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझने और उसे व्यवहार में उतारने का आह्वान किया।
    शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सह संयोजक संजय स्वामी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देती है। यदि समाज भारतीय जीवन मूल्यों को अपनाकर जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संकल्प ले, तो आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित एवं स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है। उन्होंने पर्यावरण जागरूकता को जनआंदोलन बनाने का आह्वान किया।
    कार्यक्रम की अध्यक्षता रादुविवि कुलगुरु डॉ. राजेश वर्मा ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने राष्ट्रीय एकता एवं भारतीय भाषाओं के महत्व पर बल देते हुए उपस्थित सभी लोगों को एक नाम भारत का संकल्प दिलाया तथा अपनी मातृभाषा में हस्ताक्षर करने की शपथ भी दिलाई। उन्होंने कहा कि मातृभाषा में कार्य करना आत्मगौरव, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। भारतीय भाषाओं के व्यापक उपयोग से ही ज्ञान का लोकतंत्रीकरण और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव है। मंच पर श्रीराम ग्रुप के संचालक आरके करसोलिया, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा के कुलगुरु डॉ. राजेंद्र कुरारिया, स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय, सागर के कुलाधिपति डॉ. अजय तिवारी, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, महाकौशल के प्रांत संयोजक (पर्यावरण) डॉ. सुरेंद्र सिंह, अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा, जबलपुर संभाग डॉ. अल्केश चतुर्वेदी तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का स्वागत भाषण श्रीराम ग्रुप के संचालक डॉ. पटेल ने दिया। कार्यक्रम में डॉ. अशोक खंडेलवाल (कुलगुरु, मेडिकल विश्वविद्यालय, जबलपुर), डॉ. पवन तिवारी, डॉ. एस. एस. संधू, डॉ. राकेश बाजपेयी डॉ. आशुतोष दुबे, डॉ. ध्रुव दीक्षित, डॉ. संजय तिवारी, डॉ. भरत सोलंकी, डॉ आशीष गुप्ता, डॉ. शैलेश गुप्ता, डॉ अविनाश गौर, डॉ समीर वैद्य, डॉ प्रदीप उप्पल, डॉ प्रदीप दुबे, डॉ शकुंतला पटेल, श्री शुभम खरे, डॉ. शुकदेव बाजपेयी, डॉ. विकास जैन, धर्मेंद्र कुशवाहा, ओम शर्मा सहित अनेक शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के अंत में डॉ. योगेश मोहन दुबे ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, सहयोगी संस्थाओं एवं आयोजन समिति के प्रति आभार व्यक्त किया।

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