
डिजिटल लेन-देन के साथ मर्चेंट सरचार्ज का भी विरोध, नो यूपीआई डे का सबसे अधिक असर राजबाड़ा सहित प्रमुख बाजारों में नजर आया
इंदौर। पूरे देश (India) में इंदौर (Indore) के व्यापारियों (traders) ने कल नो यूपीआई डे (No UPI Day) मनाकर एक नई मिसाल कायम की और करोड़ों रुपए के कारोबार का नुकसान भी सहा। यहां तक कि अपनी दुकानों पर आए ग्राहकों को भी नकद राशि ना लाने पर वापस लौटाने का साहसिक निर्णय भी लिया गया। राजबाड़ा सहित सभी प्रमुख बाजारों में यूपीआई क्यूआर कोड को काले कपड़े से ढंका गया और तमाम न्यूज चैनलों पर भी देशभर में यह विरोध प्रदर्शन नजर आया।
सवा सौ से अधिक छोटे-बड़े व्यापारिक संगठनों ने इस एक दिनी विरोध की ना सिर्फ घोषणा की, बल्कि उसे सफलतापूर्वक अंजाम पर भी पहुंचाया। नो यूपीआई डे पर कल ठेले वाले से लेकर शॉपिंग मॉल से लेकर सारे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर सिर्फ नकद भुगतान ही किया गया। अहिल्या चेम्बर ऑफ कॉमर्स के आह्वान पर इंदौर रिटेल गारमेंट एसोसिएशन भी इस अभियान में कूदा और राजवाड़ा से लेकर पूरे क्षेत्र में इस विरोध का असर सबसे ज्यादा देखा गया। दुकानों पर तख्तियां भी लगाई गई, जिसमें लिखा था कि डिजिटल की बजाय नकद लेन-देन ही किया जाएगा। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि नो यूपीआई डे के कारण कल इंदौर में सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 37 करोड़ रुपए के लेन-देन में कमी दर्ज की गई। अकेले राजबाड़ा क्षेत्र में ही 2 हजार से अधिक यूपीआई बार कोड बॉक्स और स्कैनर एक स्थान पर ही विरोधस्वरूप जमा कर दिए गए। यहां तक कि कई ग्राहकों को बिना खरीददारी के ही लौटना पड़ा, क्योंकि वे पर्याप्त नकद राशि अपने साथ नहीं लाए थे। व्यापारियों का कहना है कि किसी भी ग्राहक को वापस लौटाना इतना आसान नहीं होता। मगर कल इंदौरी व्यापारियों ने इस मामले में भी एकजुटता दिखाई और अपना आर्थिक नुकसान भी सहा। व्यापारियों का कहना है कि उनकी आपत्ति यूपीआई या किसी भी डिजिटल भुगतान के विरोध में नहीं है, बल्कि 15 अक्टूबर से जो मर्चेंट सरचार्ज 0.4 फीसदी थोपा जा रहा है उसका विरोध किया गया है। दो हजार रुपए से अधिक के भुगतान पर यह मर्चेंट डिस्काउंट रेट व्यापारियों को ही भुगतना पड़ेगा, जिसका भार अंत में ग्राहकों पर ही पड़ेगा।
भाजपाई भी संपट भूले… कैसे समझाएं व्यापारियों को
इस विरोध को लेकर भाजपाई भी संपट भूल गए हैं। पार्टी की भाजपा की आर्थिक और व्यापारिक प्रकोष्ठ की टीम अभी तक व्यापारियेां को समझाने के मामले में कोई पहल नहीं कर पा रही है। वैसेे भाजपा की प्रदेश सरकार ने इंदौर से व्यापारिक प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक का जिम्मा धीरज खंडेलवाल को दिया है, वहीं भाजपा के पास आर्थिक प्रकोष्ठ भी है, जो लगातार ऐसे नए नियमों और कानूनों को लेकर व्यापारियों में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास करता है, लेकिन इस बार दोनों ही प्रकोष्ठ निष्क्रिय पड़े हुए हैं। भले ही वित्तमंत्री ने इस मामले में कहा है कि इसमें व्यापारियों का नुकसान नहीं होगा। यही बात व्यापारिक और आर्थिक प्रकोष्ठ व्यापारियों को समझाने में नाकाम रहा है। इसका असर यह हुआ कि अब इसका विरोध निचले स्तर तक तेजी से हो रहा है। भाजपा भी नहीं समझ पा रही है कि कौन से तर्क देकर व्यापारियों को विश्वास दिलाया जा सके कि एमडीआर उनके लिए गलत नहीं है। इसके चलते प्रदेश में जो हालात बन गए हैं, उसे अब संभालना भाजपा संगठन के हाथ में भी नहीं है।
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