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जो तरक्की कर चुके वो दूसरों को मौका दें… आरक्षण पर बोले भागवत

August 07, 2026

मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए शुरू किया गया था और जब तक असमानता बनी रहेगी, यह लागू रहेगा. उन्होंने कहा कि लेकिन जो लोग तरक्की कर चुके हैं, उन्हें आगे के लाभ छोड़ने पर विचार करना चाहिए ताकि दूसरे लोग भी इन मौकों का फ़ायदा उठा सकें. आरएसएस प्रमुख ने कहा कि आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया, जिससे समाज में कड़वाहट पैदा हुई.

मोहन भागवत ने कहा कि आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिसका सही और गलत तय करना उतना आसान नहीं है, जितना टीवी डिबेट और चुनावी मंचों पर दिखाई देता है. कई बार इसके सही और गलत होने की मान्यता आपकी अपनी निजी मान्यताओं, सामाजिक अनुभवों और ऐतिहासिक समझ पर निर्भर करती है.

उन्होंने कहा कि यही वजह है कि आरक्षण भारतीय समाज और राजनीति के सबसे पेचीदा सवालों में से एक है. यह मुद्दा जितना जटिल है, उतना ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है. शायद यही वजह है कि ज़्यादातर राजनीतिक दल इस पर खुलकर वैचारिक बहस करने से बचते हैं और अक्सर इसे चुनावी गणित तक सीमित कर देते हैं.

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर अपने संगठन और उससे जुड़े विभिन्न संगठनों के सामने स्पष्ट रूप से अपने विचार रखे. उनका उद्देश्य केवल बाहरी संदेश देना नहीं था, बल्कि संघ परिवार के भीतर भी इस विषय पर किसी प्रकार का भ्रम न रहे. उन्होंने मुख्य रूप से पांच बिंदुओं पर जोर दिया, और इन पांच बिंदुओं के माध्यम से आरक्षण की बहस को भावनाओं से निकालकर सामाजिक वास्तविकताओं की ओर मोड़ने का प्रयास किया.

मोहन भागवत ने कहा कि आरक्षण की शुरुआत किसी आर्थिक योजना के तौर पर नहीं हुई थी. इसकी जड़ें भारतीय समाज की उस संरचना में हैं, जहां जाति, अस्पृश्यता और छुआछूत जैसी व्यवस्थाओं ने कुछ समुदायों को सदियों तक सामाजिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक अवसरों से दूर रखा. जब किसी वर्ग को शिक्षा, भूमि, मंदिर, सार्वजनिक संसाधन और शासन व्यवस्था से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा जाता है, तो उसका असर केवल सामाजिक नहीं रहता, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक भी हो जाता है.

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसी ऐतिहासिक अन्याय को ध्यान में रखते हुए आरक्षण को एक सामाजिक उपचार के रूप में देखा था. उनका तर्क था कि केवल समान अवसर घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा. जिन लोगों को पीढ़ियों तक अवसरों से वंचित रखा गया, उन्हें कॉम्पिटीशन की दौड़ में बराबरी पर लाने के लिए विशेष प्रावधान ज़रूरी हैं.

उन्होंने कहा कि जब तक सामाजिक भेदभाव रहेगा, तब तक आरक्षण की आवश्यकता भी बनी रहेगी. अगर समाज में जाति के आधार पर भेदभाव, बहिष्कार, हिंसा, सामाजिक दूरी या अवसरों की असमानता बनी रहती है, तो आरक्षण की प्रासंगिकता भी बनी रहेगी. यह सवाल केवल सरकारी नौकरी का नहीं है. यह प्रश्न सामाजिक स्वीकृति, प्रतिनिधित्व और सम्मान का भी है. अगर आधुनिक भाषा में कहें तो ये एक पैराडॉक्स है. अगर आरक्षण अचानक खत्म हो गया तो उसकी ज़रूरत और बढ़ जाएगी, इसलिए इसे झटके से तो खत्म नहीं किया जा सकता.


  • आरक्षण के समर्थकों का मूल तर्क यही है कि समस्या अभी खत्म नहीं हुई है. दूसरी तरफ, आरक्षण के आलोचक कहते हैं कि इसका दायरा सीमित होना चाहिए या इसकी समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए. लेकिन दोनों पक्षों के बीच एक तथ्य निर्विवाद है. अगर सामाजिक भेदभाव खत्म हो जाए, तो आरक्षण की आवश्यकता खुद कमजोर पड़ने लगेगी.

    भागवत ने कहा कि डॉ. अंबेडकर को खुद ये देख कर हैरानी होती कि आरक्षण इतने लंबे वक्त तक चल रहा है. असल में आरक्षण को समझने के लिए डॉ. आंबेडकर की मूल सोच को समझना आवश्यक है. उन्होंने आरक्षण को स्थायी व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सुधार करने के तरीके के तौर पर देखा था. उनका मकसद किसी वर्ग को स्थायी विशेषाधिकार देना नहीं था, बल्कि उन समुदायों को वह स्थान दिलाना था जहां वे ऐतिहासिक रूप से कभी पहुंच ही नहीं पाए.

    बाबा साहेब बार-बार इस बात पर जोर देते थे कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है यदि समाज में बराबरी नहीं होगी, तो संविधान द्वारा दिए गए अधिकार भी व्यवहार में समान परिणाम नहीं देंगे.

    उन्होंने कहा कि यहीं से बहस सबसे मुश्किल हो जाती है. भारत में आरक्षण केवल सामाजिक नीति नहीं रहा. यह चुनावी रणनीति, जातीय समीकरण और सत्ता की राजनीति का भी हिस्सा बन चुका है. लगभग हर राजनीतिक दल आरक्षण के सवाल पर बेहद सावधानी से चलता है, क्योंकि यह सीधे बड़े मतदाता समूहों से जुड़ा हुआ है. लेकिन आरक्षण पर राजनीति और आरक्षण की राजनीति इन दोनों में अंतर है. सामाजिक न्याय पर बहस होना आवश्यक है, लेकिन यदि हर चर्चा केवल वोट बैंक के चश्मे से देखी जाएगी, तो समाधान की संभावना कम होती जाएगी. किसी भी लोकतंत्र में ऐसी नीतियों पर तथ्य, आंकड़े और सामाजिक यथार्थ के आधार पर संवाद होना चाहिए.

    भागवत के मुताबिक, अगर क्वालिटी शिक्षा सभी तक पहुंचे, जातिगत भेदभाव खत्म हो, सामाजिक अवसर समान हों, आर्थिक संसाधनों तक निष्पक्ष पहुंच हो, कानून का समान रूप से पालन हो और समाज वास्तव में बराबरी को स्वीकार कर ले, तो आरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे खत्म हो सकती है. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल है, क्या हम उस स्थिति तक पहुंच चुके हैं?

    आरक्षण का वास्तविक विकल्प आरक्षण का विरोध नहीं है. उसका वास्तविक विकल्प है ऐसा समाज, जहां किसी बच्चे का भविष्य उसकी जाति से तय न हो. जहां सामाजिक सम्मान जन्म से नहीं, योग्यता और मानवीय गरिमा से मिले. जहां अवसरों तक पहुंच समान हो और जहां संविधान की समानता केवल कागज पर नहीं, जीवन में दिखाई दे.

    इसलिए आरक्षण पर बहस करते समय सबसे पहले यह समझना होगा कि असली मुद्दा आरक्षण नहीं, बल्कि वह सामाजिक भेदभाव है, जिसने आरक्षण की आवश्यकता पैदा की. जब तक कारण मौजूद है, तब तक उपचार पर बहस अधूरी रहेगी. और जिस दिन वजह खत्म हो जाएगी, उसी दिन आरक्षण पर होने वाली अधिकांश बहस भी खुद-ब-खुद खत्म होने लगेगी.

    भारत के सामने चुनौती केवल यह तय करने की नहीं है कि आरक्षण कितना हो, किसे मिले या कितने समय तक चले. असली चुनौती यह है कि क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं, जहां आरक्षण की आवश्यकता ही न बचे. वहीं दिन सामाजिक न्याय की वास्तविक जीत का दिन होगा.

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