
जबलपुर। मझौली स्थित मां अन्नापूर्णा वेयर हाउस, पिपारिया में सामने आए 11.37 करोड़ रुपये के बहुचर्चित गेहूं घोटाले में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज किए जाने के बावजूद विभागीय कार्रवाई की रफ्तार सवालों के घेरे में है। मामले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़े कर्मचारी आनंद भारसाकले और प्रकाश पांडे के नाम भी आरोपियों में शामिल हैं, लेकिन एफआईआर दर्ज होने के लगभग एक माह बाद भी इनके खिलाफ सेवा समाप्ति अथवा अन्य विभागीय कार्रवाई नहीं की गई है।
भौतिक सत्यापन में खुली करोड़ों की गड़बड़ी
मामले का खुलासा उस समय हुआ जब प्रशासनिक टीम ने उपार्जन केन्द्र का भौतिक सत्यापन किया। जांच के दौरान रिकॉर्ड और वास्तविक भंडारण में बड़ा अंतर सामने आया। सत्यापन में 5167.70 क्विंटल गेहूं कम पाया गया, जिसकी अनुमानित कीमत 1 करोड़ 37 लाख 67 हजार 837 रुपये आंकी गई। जांच में यह भी सामने आया कि उपार्जन केन्द्र को मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन द्वारा कुल 92,250 बारदाने उपलब्ध कराए गए थे। जबकि खरीदी की वास्तविक मात्रा 48,347.07 क्विंटल के अनुसार उपयोग किए जाने वाले बारदानों की संख्या इससे काफी कम होनी चाहिए थी। आरोप है कि केन्द्र द्वारा फर्जी तरीके से 96,694 बारदानों के उपयोग की जानकारी पोर्टल पर अपलोड की गई, जिससे पूरे खरीदी रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
नियमों को दरकिनार कर जोड़े गए कर्मचारी
जांच में खरीदी प्रक्रिया के दौरान कई अनियमितताएं सामने आई हैं। दस्तावेजों के अनुसार खरीदी कार्य में केवल अधिकृत कर्मचारियों को शामिल किया जाना था, लेकिन अमन पांडे और आकाश पांडे को कथित रूप से नियमों के विपरीत खरीदी कार्य में लगाया गया।आरोप है कि अमन पांडे तुलाई, सिलाई और तौल पर्ची काटने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। इसके बाद कम्प्यूटर ऑपरेटर मयूरी लोधी और शुभम बर्मन द्वारा संबंधित जानकारी पोर्टल पर दर्ज की जाती थी। जांच एजेंसियों का मानना है कि इसी प्रक्रिया के माध्यम से रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई।
11.37 करोड़ के घोटाले में दर्ज हुई एफआईआर
प्रकरण की जांच के बाद पुलिस ने उपार्जन समिति भूमि ग्राम संगठन की अध्यक्ष एवं खरीदी केन्द्र प्रभारी रीना लोधी, शुभम बर्मन, मयूरी लोधी, प्रमोद कुमार मिश्रा, प्रकाश पांडे, आनंद भारसाकले, अमन पांडे, आकाश पांडे, अनिल पटेल और रिंकू साहू के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है।एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस जांच जारी है, लेकिन विभागीय स्तर पर कार्रवाई की धीमी गति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि जब आरोपित कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हो चुका है और वे लंबे समय से अनुपस्थित हैं, तो उनकी सेवा समाप्ति की प्रक्रिया अब तक क्यों शुरू नहीं की गई।
जवाब का इंतजार
घोटाले की गंभीरता को देखते हुए अब निगाहें जिला प्रशासन और एनआरएलएम विभाग पर टिकी हैं। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये के इस घोटाले में नामजद कर्मचारियों के खिलाफ विभाग कब कार्रवाई करेगा और क्या जिम्मेदार अधिकारियों से भी जवाबदेही तय की जाएगी। फिलहाल, एफआईआर के एक माह बाद भी कार्रवाई की फाइलें आगे नहीं बढऩे से पूरे मामले में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
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