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शराबबंदी के साये में ‘सूखे नशे’ का जाल, बिहार के गांव-शहर में बढ़ता संकट

May 02, 2026

पटना। बिहार में शराबबंदी (Prohibition of alcohol) लागू होने के बाद नशे का स्वरूप तेजी से बदलता नजर आ रहा है। अब ‘सूखे नशे’ ने अपनी पैठ बना ली है और खासतौर पर युवा पीढ़ी (Young generation) इसकी चपेट में आती जा रही है। मधेपुरा (Madhepura) समेत कई जिलों में हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं, जहां स्मैक, गांजा और कोडिन युक्त कफ सिरप जैसे नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं।

स्थिति यह है कि यह समस्या अब शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांवों में भी तेजी से फैल चुकी है। सीमावर्ती इलाकों में स्मैक का कारोबार खुलकर सामने आ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, महज 300 से 400 रुपये में स्मैक की पुड़िया आसानी से मिल रही है, जिससे युवा तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं।

शराबबंदी के बाद बदला नशे का ट्रेंड

शराबबंदी के बाद नशा करने वालों ने ऐसे विकल्प तलाश लिए हैं, जिनमें गंध नहीं होती और जिन्हें छिपाना आसान है। कोडिन युक्त कफ सिरप का इस्तेमाल अब इलाज से ज्यादा नशे के लिए किया जा रहा है। जानकार बताते हैं कि 200 मिलीलीटर कफ सिरप का असर शराब की एक बोतल जितना हो सकता है, लेकिन इसकी पहचान करना मुश्किल होता है।

इसके अलावा, व्हाइटनर, पेनकिलर और अन्य केमिकल आधारित पदार्थ भी युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहे हैं।


  • तस्करी और नेटवर्क की जड़ें गहरी

    इस पूरे खेल के पीछे एक संगठित नेटवर्क सक्रिय बताया जा रहा है। नेपाल सीमा से गांजा और स्मैक की तस्करी की बात सामने आ रही है, जिसमें कई युवा खुद भी शामिल हैं। अधिक कमाई के लालच में वे न केवल खुद बर्बाद हो रहे हैं, बल्कि अपने साथियों को भी इस दलदल में धकेल रहे हैं।

    सामाजिक कारण भी जिम्मेदार

    विशेषज्ञ मानते हैं कि बेरोजगारी, गलत संगत और सस्ती उपलब्धता इस समस्या को और बढ़ा रही है। शराब की ऊंची कीमतों के कारण भी युवा सस्ते लेकिन खतरनाक विकल्पों की ओर झुक रहे हैं।

    सेहत पर गहरा असर

    डॉक्टरों के अनुसार, ‘सूखा नशा’ शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचाता है। इससे न सिर्फ शारीरिक कमजोरी बढ़ती है, बल्कि मानसिक संतुलन भी बिगड़ सकता है। नशे की यह लत इतनी खतरनाक है कि बिना चिकित्सकीय मदद के इसे छोड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।

    केवल कार्रवाई नहीं, जागरूकता भी जरूरी

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने, नशामुक्ति केंद्रों को मजबूत करने और समाज की सामूहिक भागीदारी जरूरी है।

    अगर समय रहते इस बढ़ते खतरे पर काबू नहीं पाया गया, तो आने वाली पीढ़ी पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यह स्थिति समाज के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।

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