भोपाल न्यूज़ (Bhopal News)

मशहूर अफसानानिगार नईम क़ोसर के इंतक़ाल से उर्दू-हिंदी के अदीबों में शोक

जिंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है,
मौत भी इक सवाल है जिस का जवाब कुछ नहीं

भोपाल ही नहीं बैरूनी मुमालिक तक मक़बूल मायानाज़ अफसानानिगार (कथाकार) और उर्दू सहाफी नईम क़ोसर साब कल इंतक़ाल फऱमा गए। भोपाल की अदबी महफिलों और शायराना नशिस्तों की शान रहे नईम साब ने 87 बरस की उमर पाई। गुजिश्ता 23 दिसम्बर को ब्रेन स्ट्रोक की वजे से वो ज़ेरे इलाज थे। करीब 15 दिन जि़न्दगी और मौत से जूझते हुए वो चल बसे। उन्हें तकिया कलंदर शाह के क़ब्रिस्तान में सुपुर्दे ख़ाक किया गया। जैसा साफ शफ्फ़़ाफ़ उनका लेखन था वैसे ही नफीस और सूटेड बूटेड वो रहते थे। आपने जुगनू नाम से एक रिसाला और सदा-ए-उर्दू नाम से एक अखबार भी निकाला। वे नवाबी दौर के मशहूर अदीब क़ोसर चांदपुरी साब के फज़ऱ्न्द थे। नईम क़ोसर साब 1936 में रायसेन जिले के बेगमगंज में पैदा हुए। 13 बरस की उमर में उन्होंने पहली कहानी ‘यतीम बच्चे की ईदÓ लिखी। इसके बाद ये सिलसिला ताउम्र चला। आप उर्दू और हिंदी के कहानीकारों और अदीबों में बहुत मक़बूल थे।



उनके 8 कहानी संग्रहों में ख्वाबों का मसीहा (कुल 19 कहानियाँ 1999), काल कोठरी (कुल 18 कहानियाँ, 2001), रगे जां का लहू (हिंदी कहानियाँ, 2003), इकरारनामा (कुल 14 कहानियाँ 2006), चौथा संग्रह अग्नि परीक्षा, 2009, आखरी रात (2011),कोहरे का चांद (2018) खास हैं। उनकी अदबी खिदमात के लिए भोपाल और भोपाल के बाहर मुख्तलिफ इदारों ने उन्हें अवार्ड नवाज़ा। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें साल 2008-09 के लिए ‘हामिद सईद खान अखिल भारतीय पुरस्कारÓ से और मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा शिखर सम्मान से भी सम्मानित किया था । मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की डायरेक्टर नुसरत मेहंदी साहेबा ने कहा कि उनके जाने से उर्दू अदब का बड़ा नुकसान हुआ है। उनकी कहानियों में सामाजिक कुरीतियों की मुखालफत के साथ ही रिश्तों की बुनावट नुमायां होती थी। उनके लेखन में जिस रवानी और लयकारी के दीदार होते थे उससे पढऩे वाला उनके अफसानों के संग बहता चलता। शहर के उर्दू साहित्यकार इक़बाल मसूद साब ने कहा कि उनका जाना मेरा जाती (व्यक्तिगत) नुकसान है। वो मुझे छोटा भाई मानते थे। वो प्रोग्रेसिव राइटर्स संघ से भी वाबस्ता थे। भोपाल की उर्दू अदब की महफिलों में उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। वो अपने पीछे अपनी शरीके हयात, बेटा नवेद और दो बेटियों सहित भरेपूरे कुनबे को छोड़ गए। इस मशहूर अफसानानिगार को दिल की गहराइयों स खिराजे अक़ीदत।

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