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MP : 5 लाख रुपये में खरीदी डिग्री और बन गए सरकारी डॉक्टर, पूरे प्रदेश में मचा हड़कंप

June 08, 2026

भोपाल/दमोह/ग्वालियर. मध्य प्रदेश (MP) का दमोह (Damoh) जिला एक बार फिर फर्जी डॉक्टरों (Quack doctors) के काले कारनामों की वजह से सुर्खियों में है. पिछले साल जहां कथित फर्जी हार्ट सर्जन एम. जॉन केन का मामला सामने आया था, वहीं अब दमोह में फर्जी MBBS डिग्री के सहारे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी कर रहे एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हुआ है. लेकिन अब इस मामले के तार सीधे राजधानी भोपाल तक जुड़ते दिखाई दे रहे हैं.

पुलिस ने अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें तीन कथित डॉक्टर, फर्जी डिग्री तैयार करने वाला मास्टरमाइंड नेटवर्क और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) का एक डेटा क्लर्क शामिल है. आरोप है कि यह गिरोह लाखों रुपये लेकर नकली MBBS डिग्रियां तैयार करता था और सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में नियुक्तियां तक दिलवा रहा था.


  • मामले का खुलासा तब हुआ जब दमोह के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को शिकायतें मिलीं कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत संचालित संजीवनी क्लीनिकों में कुछ डॉक्टर संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर नौकरी कर रहे हैं. प्रारंभिक जांच में शिकायतें सही पाए जाने के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और फिर एक-एक कर पूरे रैकेट की परतें खुलने लगीं.

    जांच के दौरान सबसे पहले ग्वालियर निवासी कुमार सचिन यादव और सीहोर निवासी राजपाल गौर को हिरासत में लिया गया. दोनों के दस्तावेजों की जांच में उनकी MBBS डिग्रियां पूरी तरह फर्जी पाई गईं. पूछताछ में दोनों ने स्वीकार किया कि उन्होंने 5 लाख रुपये खर्च कर नकली डिग्रियां बनवाई थीं और उन्हीं के आधार पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी हासिल की थी.

    इन दोनों की निशानदेही पर पुलिस ने जबलपुर से अजय मौर्य नामक एक अन्य कथित डॉक्टर को गिरफ्तार किया. उसकी डिग्री भी जांच में फर्जी निकली. तीनों गिरफ्तारियों के बाद पुलिस को एक संगठित नेटवर्क की जानकारी मिली, जो वर्षों से स्वास्थ्य व्यवस्था में सेंध लगा रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि इस पूरे रैकेट का कथित सरगना ग्वालियर निवासी मुकेश चौधरी है, जो फिलहाल फरार है.

    राजधानी भोपाल से जुड़े तार सबसे चौंकाने वाला खुलासा भोपाल से जुड़ा है. जांच में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन भोपाल में पदस्थ डेटा क्लर्क आदिल सिद्दीकी की भूमिका भी सामने आई है. आरोप है कि वह नियुक्ति प्रक्रिया में दस्तावेजों को सिस्टम के भीतर आगे बढ़ाने और सत्यापन प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद करता था. पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया है. उसका सहयोगी हीरा सिंह भी इस फर्जीवाड़े में शामिल था. दोनों को गिरफ्तार कर दमोह पुलिस अपने साथ ले गई है. दोनों मिलकर एक डिग्री के एवज में चार से पांच लाख रुपये तक वसूलते थे.

    NHM ने डिग्री जांचना शुरू की इस खुलासे के बाद राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने पूरे प्रदेश में बड़े स्तर पर जांच शुरू कर दी है. शुरुआती जांच में प्रदेश के विभिन्न जिलों से नौ फर्जी डॉक्टरों की पहचान की जा चुकी है. सभी को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है और उनके खिलाफ संबंधित थानों में धोखाधड़ी के मामले दर्ज कराए गए हैं.

    फर्जी डिग्री से कैसे करते होंगे इलाज?
    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने कभी असली मेडिकल शिक्षा हासिल ही नहीं की, वे सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में मरीजों का इलाज कैसे करते रहे? आखिर नियुक्ति और सत्यापन की प्रक्रियाएं किस स्तर पर फेल हुईं? और कितने मरीजों की जिंदगी ऐसे कथित डॉक्टरों के भरोसे छोड़ दी गई?

    बता दें कि पिछले साल ही एक ऐसे डॉक्टर का मामला सामने आया था जिसके पास फर्जी डिग्री थी, लेकिन उसने कई लोगों के दिल की सर्जरी कर दी थी और आरोप है कि 7 लोगों की मौत उसके इलाज के बाद हो गई थी.

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