कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही खींचतान अब चुनाव आयोग (Election Commission) के दरवाजे तक पहुंच गई है। ऋतुब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के नेतृत्व वाले बागी गुट ने मंगलवार को निर्वाचन आयोग के कोलकाता क्षेत्रीय कार्यालय में दस्तावेज जमा कर खुद को पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि बताया। गुट का दावा है कि उसे पार्टी के अधिकांश विधायकों का समर्थन हासिल है और इसी आधार पर उसने “असली टीएमसी” होने का दावा पेश किया है।
बागी खेमे के नेताओं ने बताया कि हाल ही में आयोजित विशेष अधिवेशन और नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के बाद सभी आवश्यक दस्तावेज आयोग को सौंपे गए हैं। उनके अनुसार, दस्तावेज पहले ही नई दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग मुख्यालय में जमा किए जा चुके हैं और अब उनकी प्रतियां कोलकाता कार्यालय को भी उपलब्ध करा दी गई हैं।
मीडिया से बातचीत में ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि पूरी प्रक्रिया पार्टी संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुरूप अपनाई गई है। उन्होंने कहा कि यदि दोनों पक्षों ने अलग-अलग राष्ट्रीय परिषद और पदाधिकारियों की सूची आयोग को सौंपी है तो अंतिम निर्णय निर्वाचन आयोग ही करेगा। उनके मुताबिक जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
पार्टी के चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को लेकर पूछे गए सवाल पर बागी गुट ने स्पष्ट किया कि वे अलग संगठन के रूप में मान्यता नहीं मांग रहे हैं, क्योंकि उनका दावा है कि वही मूल तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए चुनाव चिह्न पर उनका अधिकार स्वाभाविक रूप से बनता है।
बागी नेताओं ने सोशल मीडिया पर चल रही निलंबन और निष्कासन संबंधी खबरों को भी खारिज किया। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर हाल के दिनों में कई राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदले हैं और समर्थन के समीकरण लगातार बदल रहे हैं।
निर्वाचन आयोग के कार्यालय पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में ऋतब्रत बनर्जी के अलावा Arup Roy, Javed Khan, संदीपन साहा और अखरुज्जमान समेत कई नेता शामिल थे।
बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 80 में से 64 विधायक उनके साथ हैं और उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नया संगठनात्मक ढांचा तैयार किया है। दूसरी ओर Mamata Banerjee और Abhishek Banerjee का खेमा भी खुद को पार्टी का वैध नेतृत्व बता रहा है।
अब सभी निगाहें निर्वाचन आयोग पर टिकी हैं, जिसे दोनों पक्षों के दावों, दस्तावेजों और समर्थन के आंकड़ों की जांच के बाद यह तय करना होगा कि तृणमूल कांग्रेस की आधिकारिक पहचान और चुनाव चिह्न पर किस गुट का अधिकार बनता है। यह फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति में दूरगामी असर डाल सकता है।
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