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मौत से पहले पिता को भेजे WhatsApp मैसेज बने अहम सबूत, हाईकोर्ट ने माना ‘डाइंग डिक्लेरेशन’; तीन आरोपियों को नहीं मिली जमानत

August 07, 2026

इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की इंदौर खंडपीठ ने आत्महत्या से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए मृतक द्वारा मौत से पहले अपने पिता को भेजे गए व्हाट्सऐप (WhatsApp) संदेशों को प्रथम दृष्टया ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ (Dying declaration) के रूप में स्वीकार किया है। अदालत ने इन्हीं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और अन्य उपलब्ध सबूतों को आधार मानते हुए तीन आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।

जमीन विवाद के बाद आत्महत्या का आरोप

मामला धार जिले का है, जहां 25 वर्षीय संतोष उर्फ लखन औसारी ने कथित तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन के अनुसार, कृषि भूमि से जुड़े पुराने विवाद को लेकर करण जाट, धर्मेंद्र जाट और उमेश जाट उस पर लगातार दबाव बना रहे थे। उन पर गाली-गलौज, अपमानित करने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप हैं। बताया गया कि इसी मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर संतोष ने आत्महत्या कर ली।



  • मौत से पहले पिता को भेजे थे तीन WhatsApp संदेश

    सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि मृतक के मोबाइल फोन की जांच में महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मिले। रिकॉर्ड के अनुसार, संतोष ने आत्महत्या से कुछ समय पहले अपने पिता के मोबाइल नंबर पर तीन व्हाट्सऐप संदेश भेजे थे। इन संदेशों में उसने कथित रूप से अपनी परेशानी का जिक्र करते हुए तीनों आरोपियों के नाम लिखे थे।

    हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया ये संदेश मृत्यु से ठीक पहले दिए गए बयान की श्रेणी में आते हैं और मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में देखे जा सकते हैं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मृतक के पिता और भाई के पुलिस के समक्ष दर्ज बयान भी अभियोजन की कहानी का समर्थन करते हैं।

    बचाव पक्ष ने साजिश में फंसाने का लगाया आरोप

    आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि उनका संतोष की आत्महत्या से कोई संबंध नहीं है और पुरानी रंजिश के कारण उन्हें झूठा फंसाया गया है। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद माना कि आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है। ऐसे में उन्हें जमानत देने का कोई उचित आधार नहीं बनता।

    निचली अदालत का फैसला भी बरकरार

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने धार के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम) द्वारा जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही आरोपियों की अपील भी निरस्त कर दी। अदालत के इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि डिजिटल माध्यम से भेजे गए संदेश भी परिस्थितियों के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण साक्ष्य का आधार बन सकते हैं।

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