ब्‍लॉगर

कौन कर रहा है डॉक्टरों को खुदखुशी के लिए बाध्य

– आर.के. सिन्हा

राजस्थान के दौसा जिले में एक महिला डॉक्टर का आत्महत्या करना चीख-चीख कर इस चिंता की पुष्टि कर रहा है कि अब वक्त आ गया है कि देश के डॉक्टरों को भी तो बचाया जाए। अगर यह नहीं किया गया तो डॉक्टर बनने से पहले नौजवान सौ-सौ बार सोचेंगे। जान लें कि दौसा में डॉ.अर्चना शर्मा और उनके पति डॉ. सुनीत उपाध्याय का उस इलाके का एक प्रतिष्ठित आनंद अस्पताल है। कुछ दिन पहले उनके पास लालूराम बैरवा नाम का एक शख्स अपनी पत्नी आशा देवी (22) को डिलीवरी के लिए सुबह अस्पताल आया। डिलीवरी के दौरान प्रसूता (आशा देवी) की मौत हो गई। नवजात सकुशल है। यह एक सामान्य सी प्रसव पीड़ा के दौरान मृत्यु की घटना है। अब शुरू हुआ है हंगामा।

आशा देवी की मौत के बाद उसके घरवालों ने मुआवजे की मांग को लेकर अस्पताल के बाहर जमकर बवाल काटा। गुस्साए घरवालों ने स्थानीय छुटभैये नेताओं का दबाव बनाकर डॉ.अर्चना शर्मा के खिलाफ हत्या का मामला पुलिस में दर्ज करवा दिया। इससे वह महिला चिकित्सा बुरी तरह से घबरा गई और उन्होंने खुदकुशी ही कर ली। महिला डॉक्टर की आत्महत्या के मामले को लेकर राजस्थान के सभी डॉक्टरों ने हड़ताल भी की। दौसा से मिल रही खबरों के अनुसार असामाजिक एवं अराजक तत्वों के अनैतिक दबाव के कारण ही डॉक्टर ने आत्महत्या की है। यह बेहद दुखद मामला है। डॉ.अर्चना शर्मा का इन हालातों में संसार से चले जाना दिल दहलाने वाला है। वह बेहद मेधावी मेडिकल छात्रा रही थीं। जब बहुत से डॉक्टर सिर्फ बड़े शहरों तथा महानगरों में ही नौकरी या प्रैक्टिस करना चाहते हैं, तो वह जयपुर से 70 किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे में अपने पति के साथ प्रैक्टिस कर रही थीं। दौसा के लोगों के लिए हर वक्त उपलब्ध रहती थीं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल ने मुझे बताया कि डा.अर्चना शर्मा गांधीनगर मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भी रही थीं। वह मानती थीं कि हरेक डॉक्टर की जिम्मेदारी है कि वह देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वालों की भी सेवा करे।

डॉ.अर्चना शर्मा से जुड़े केस से हटकर भी बात करें तो अचानक से अब रोगियों के संबंधी और दोस्त बात-बात पर डॉक्टरों की ठुकाई करने लगते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि डॉक्टर सिर्फ रोगी को ठीक करने का प्रयास भर कर सकता है। वह कोई भगवान नहीं है। पर डॉक्टरों और आमजन के बीच में अविश्वास की खाई गहरी ही होती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से इस तरह की खबरें मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं जब रोगी के परिचितों ने डॉक्टरों के हाथ-पैर तोड़ दिए। आप अगर कभी राजधानी के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में जाएं तो वहां पर आपको बलिष्ठ भुजाओं वाले बहुत से बाउंसर अलग-अलग जगहों पर खड़े हुए मिल जाते हैं। इनकी यहां पर तैनाती की वजह पूछने पर पता चला कि यहां पर डॉक्टरों पर लगातार होने वाले हमलों को देखते हुए अस्पताल मैनेजमेंट की तरफ से उन्हें तैनात किया गया है। ये दिन-रात यहां रहते हैं। याद रख लें कि अगर डॉ.राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी डॉक्टर सुरक्षित नहीं हैं तो फिर बाकी जगहों की बात करना बेकार है।

डॉ.राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सरकारी बाबुओं से लेकर देश के सांसदों और मंत्रियों तक का इलाज होता है। कोरोना काल में यहां के डॉक्टरों ने अनगिनत लोगों की जानें बचाई थीं। डॉक्टरों के साथ बदतमीजी या मारपीट करना किसी भी सभ्य समाज में सही नहीं माना जा सकता । इसकी घोर निंदा सर्वत्र होनी ही चाहिए और जो इस तरह की अक्षम्य हरकतें करते हैं उन्हें कठोर दंड भी मिलना चाहिए। अब भी देशभर में लाखों की संख्या में निष्ठावान डॉक्टर हैं। वे रोगी का पूरे मन से इलाज करके उन्हें स्वस्थ करते हैं। यह सोच सिरे से गलत है कि सभी डॉक्टर लूटते ही हैं। इस तरह की मानसिकता के कारण ही डॉक्टर और रोगी अब आमने-सामने हैं। इनके संबंधों में पहले वाली प्रेम और सम्मान नजर नहीं आता। आपको पटना से लेकर लखनऊ और दिल्ली से मुंबई समेत देश के हरेक शहर और गांव में सुबह से देररात तक कड़ी मेहनत करते डॉक्टर मिल जाएंगे। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब देशभर के डॉक्टरों, नर्सों और अन्य मेडिकल स्टाफ ने कोरोना वायरस को मात देने के लिए अपने प्राणों को भी दांव पर लगा दिया था। जरा सोचिए कि उस भयावह दौर में अगर ऐसे सेवा भावी डॉक्टर और नर्स भी हमारे साथ न होते तो क्या होता।

वैसे डॉक्टरों पर कातिलाना हमलों का इतिहास पुराना है। राजधानी दिल्ली के करोल बाग में डॉ.एन.सी.जोशी का 1947 में कत्ल कर दिया गया था। इस वक्त वे दिल्ली में भड़के दंगों के घायलों का इलाज कर रहे थे। राजधानी में उनके नाम पर एक अस्पताल भी है। यह याद रखा जाएगा कि ये डॉक्टर कोरोना काल में देश की जनता के लिये फरिश्ते बनकर आए थे। कोरोना की दूसरी लहर को प्रलय जैसी स्थिति कहा जा सकता है। तब भी ये हमारे करीब खड़े थे। हमने इन्हें देखा-पहचाना था। ये अपना फर्ज निभा रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर के असर के कारण देशभर के अस्पताल एक अदद बेड से लेकर आक्सीजन, दवाओं वगैरह के लिए कराहने लगे थे। तब ये डॉक्टर ही हमारे लिये उम्मीद की किरण के रूप में खड़े हुए थे।। ये दिन-रात रोगियों को बेड दिलवा रहे थे। ये रोगियों के संबंधियों से फोन और व्हाट्स ऐप पर बातें कर रहे थे और करवा भी रहे थे । उन्हें उनके रोगी का ठीक होने का वादा-भरोसा दे रहे थे। उनका व्हाट्स ऐप स्टेटस चेक करिए। वे रात के दो बजे भी ऑनलाइन थे और सुबह पांच बजे भी। अब जब कोरोना के बाद जिंदगी फिर से पहले की तरह पटरी पर वापस लौटने लगी है तो क्या हम इन्हें खुदखुशी करने के लिए बाध्य करेंगे।

यही तो दौसा की डॉ. अर्चना के साथ हुआ। वह भी चाहतीं तो अपने पति के साथ किसी बड़े शहर में चैन से जिंदगी गुजार सकती थीं। यह न भूला जाए कि हरेक समाज और पेशे में कुछ धूर्त तो होते ही हैं। पर वे बहुमत में कभी नहीं होते। बहुमत सज्जनों और डॉ. अर्चना शर्मा जैसों का ही होता है। इनके प्रति समाज को कृतज्ञता का भाव तो रखना होगा ही। अब देखना यह है कि अशोक गहलौत की कांग्रेसी सरकार डॉ. अर्चना शर्मा को ख़ुदकुशी करने के लिये उकसाने वालों पर क्या कारवाई करती है।

(लेखक-वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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