नई दिल्ली। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम (India’s space program) बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) धीरे-धीरे नियमित प्रक्षेपण यान और उपग्रहों (Launch vehicles and satellites) के निर्माण से पीछे हटकर रिसर्च, नई तकनीक, वैज्ञानिक मिशनों और अत्याधुनिक अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने की दिशा में बढ़ रहा है। IN-SPACe के चेयरमैन डॉ. पवन गोयनका के मुताबिक, भविष्य में रॉकेट और नियमित उपग्रहों का निर्माण निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की चुनिंदा इकाइयां करेंगी।
एक समिट में पवन गोयनका ने कहा कि इसरो की भूमिका धीरे-धीरे निर्माता से ज्यादा रिसर्च और डेवलपमेंट संस्था की हो जाएगी। उनके मुताबिक, प्रक्षेपण यानों और नियमित उपग्रहों के निर्माण की जिम्मेदारी उद्योग को देने से इसरो उन क्षेत्रों पर ध्यान दे सकेगा, जहां अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विशेषज्ञता की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि इसरो किसी भी तरह के प्रक्षेपण यान का नियमित निर्माण नहीं करेगा। इन गतिविधियों को निजी क्षेत्र या संबंधित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सौंपा जाएगा।
यह प्रक्रिया स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी SSLV से शुरू हो चुकी है। इसकी तकनीक और उत्पादन अधिकार बोली प्रक्रिया के बाद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को हस्तांतरित किए जा चुके हैं।
अब अगला बड़ा कदम PSLV और LVM3 को लेकर हो सकता है। LVM3 भारत का सबसे शक्तिशाली परिचालन रॉकेट है। गोयनका के मुताबिक, इन प्रक्षेपण यानों के उत्पादन को भी निजी क्षेत्र की ओर ले जाने की तैयारी है।
SSLV के मामले में जहां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां प्रक्रिया का हिस्सा रही हैं, वहीं PSLV और LVM3 के आगामी हस्तांतरण में निजी उद्योग को प्रमुख भूमिका मिलने की बात कही गई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि इसरो रॉकेट तकनीक से पूरी तरह बाहर हो जाएगा। बल्कि उसकी भूमिका नई तकनीकों को विकसित करने, उनका परीक्षण करने और तकनीक के परिपक्व होने के बाद उसे उद्योग तक पहुंचाने की होगी।
पवन गोयनका ने बताया कि इसरो से अब तक 120 तकनीकें निजी क्षेत्र को हस्तांतरित की जा चुकी हैं। इसका उद्देश्य देश में ऐसा स्पेस इकोसिस्टम तैयार करना है, जिसमें सरकारी एजेंसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित करे और निजी कंपनियां उसके व्यावसायिक इस्तेमाल को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाएं।
इसके साथ ही सरकार एक नए लॉन्च सेंटर के संचालन की जिम्मेदारी भी निजी उद्योग को सौंपने की तैयारी कर रही है। इसके लिए अगले चार-पांच महीनों में ऑपरेटर चुने जाने की संभावना बताई गई है।
इस बदलाव के बाद इसरो का ज्यादा ध्यान वैज्ञानिक मिशन, नई अंतरिक्ष तकनीक, विशेष उपग्रह, उन्नत इंफ्रास्ट्रक्चर और भविष्य की अंतरिक्ष क्षमताओं पर हो सकता है।
यानी रोजमर्रा के व्यावसायिक रॉकेट और उपग्रह निर्माण का बड़ा हिस्सा उद्योग संभालेगा, जबकि इसरो उन तकनीकों पर काम करेगा जिन्हें निजी कंपनियां शुरुआती स्तर पर खुद विकसित करने में सक्षम नहीं हैं।
भारत अपनी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को मौजूदा करीब 8 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2033 तक 44 अरब डॉलर करने की महत्वाकांक्षा रखता है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी मांग बढ़ाने, पारंपरिक स्पेस सेक्टर के बाहर की कंपनियों द्वारा अंतरिक्ष तकनीक के इस्तेमाल और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय कंपनियों की पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
रक्षा क्षेत्र में भी निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, रक्षा विभाग निजी कंपनियों को 31 उपग्रहों का ऑर्डर दे चुका है, जबकि इसी व्यापक कार्यक्रम के तहत 21 अन्य उपग्रहों के निर्माण की जिम्मेदारी इसरो के पास रहने की उम्मीद है।
सरल शब्दों में देखें तो भारत का मॉडल अब कुछ ऐसा हो सकता है—ISRO नई तकनीक विकसित करेगा, उसे परिपक्व बनाएगा और फिर उद्योग को सौंपेगा; निजी कंपनियां बड़े पैमाने पर उसका व्यावसायिक उत्पादन और संचालन करेंगी।
इस बदलाव से देश में रॉकेट लॉन्च, सैटेलाइट निर्माण और स्पेस-आधारित सेवाओं के क्षेत्र में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। साथ ही इसरो को भारत के अगले दौर के वैज्ञानिक और तकनीकी अंतरिक्ष मिशनों पर ज्यादा संसाधन लगाने का अवसर मिलेगा।
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