
इंदौर, राजेश ज्वेल। शासन द्वारा चलवाए गए ऑपरेशन भूमाफिया के तहत कई गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनों को दबंगों के चंगुल से छुड़वाकर भूखंड पीडि़तों में बंटवाने के अलावा सरकारी घोषित करने की प्रक्रिया भी विगत वर्षों में चलती रही। बीते दो साल से अभियान के ठंडे बस्ते में जाने और जमानतों पर जेल से छूटने के बाद भूमाफियाओं ने इन जमीनों को वापस पाने के हथकंडे शुरू कर दिए। अदालतों का सहारा लेने के साथ सहकारिता विभाग को तो फिर से कब्जे में लिया ही, साथ ही प्रशासन में भी जमावट शुरू कर दी।
नगर भूमि सीमा अधिनियम यानी शहरी सीलिंग में धारा 20 (क) के तहत गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनों को जो छूट मिली थी, उसे खत्म कर सरकारी घोषित करने का एक महत्वपूर्ण आदेश 4 नवंबर 2022 को तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह द्वारा जारी किया था और अनेक दागी संस्थाओं की जमीनें विस्तृत आदेश के जरिए सरकारी घोषित करते हुए राजस्व विभाग भोपाल को इस आशय का प्रस्ताव भी भेज दिया। इस आदेश से सैकड़ों संस्थाओं की हजारों एकड़ जमीनें सरकारी घोषित होने की प्रक्रिया में आ गई, जिनका मूल्य आज की तारीख में अरबों रुपए होता है। पिछले दिनों जमीनी जादूगरों ने एक गृह निर्माण संस्था आदर्श श्रमिक के मामले में तीन पेज का विवादित आदेश जारी करवा लिया, जिससे इन तमाम जमीनों के मुक्त होने का रास्ता साफ हो गया, मगर जैसे ही कलेक्टर को इस महाघोटाले की धमक के साथ हकीकत पता चली तो ताबड़तोड़ उन्होंने संशोधित और विस्तृत आदेश जारी कर डाला। कलेक्टर ने अपने संशोधित आदेश से भूमाफिया को ये संदेश भी दे दिया कि प्रशासन की सख्ती जारी रहेगी और उनके मंसूबे पूरे नहीं होंगे।
दरअसल तत्कालीन कलेक्टर द्वारा जारी आदेश का तोड़ ढूंढने के लिए तमाम भूमाफिया पिछले चार साल से प्रयासरत रहे। यहां तक कि इंदौर के दो पूर्व कलेक्टरों डॉ. इलैया राजा और उसके बाद आए आशीष सिंह ने तमाम दबावों-प्रभावों के बावजूद शहरी सीलिंग से प्रभावित गृह निर्माण संस्थाओं की इन जमीनों को लेकर कोई भी आदेश पारित नहीं किया। पूर्व कलेक्टर आशीष सिंह ने तो इस मामले में एक विस्तृत पत्र भी प्रमुख सचिव राजस्व विभाग को दिनांक 20/6/2024 को भेजा इसी मामले में पिछले दिनों आदर्श श्रमिक गृह निर्माण संस्था के भूखंड पीडि़तों ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें उषा नगर एक्सटेंशन निवासी ईश्वर पोरवाल ने प्राप्त आदेश के तहत उन्होंने कलेक्टर कोर्ट में अपना आवेदन प्रस्तुत कर मांग की गई कि जिस तरह अन्य गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनों को शहरी सीलिंग एक्ट की धारा 20 के उल्लंघन में शासन में वैश्ठित करने की कार्रवाई की गई, उसी तरह आदर्श श्रमिक गृह निर्माण की खजराना स्थित सर्वे नंबर 45 , 46/1 और 58/1 की कुल 2.529 हेक्टेयर जमीन को भी सरकारी घोषित किया जाए, क्योंकि इस जमीन को भी भूमाफियाओं ने अपने कब्जे में लेकर जहां पहले अपात्र और नए सदस्यों को भूखंड आबंटित कर डाले, वहीं बाद में पूरी जमीन हड़प ली।
लिहाज़ा तत्कालीन कलेक्टर मनीषसिंह द्वारा 04.11.2022 का जो विस्तृत आदेश जारी किया गया था, उसके परिपालन में आदर्श श्रमिक गृह निर्माण की जमीन को भी सरकारी घोषित किया जाए। पोरवाल के इस आवेदन की सुनवाई के चलते कलेक्टर द्वारा इस मामले में अपर कलेक्टर और सक्षम प्राधिकारी रिंकेश वैश्य से प्रतिवेदन मांगा गया, जिसमें उन्होंने यह तो माना गया कि धारा 20 की छूट का दुरुपयोग संस्था ने किया, मगर इस मामले में कार्यवाही का अधिकार अब शासन के पास नहीं है क्योंकि शहरी सीलिंग एक्ट खत्म हो गया, यानी अपर कलेक्टर रिंकेश वैश्य ने अपने प्रतिवेदन में जहां 4/11/2022 के आदेश को छुपाया, वही सीलिंग एक्ट को लेकर भी गलत तथ्य अपने प्रतिवेदन में प्रस्तुत कर डाले, जिस पर भरोसा करते हुए कलेक्टर शिवम वर्मा ने 10 फरवरी 2026 को तीन पेज का आदेश पारित किया , उसमें यह लिख दिया गया कि शहरी सीलिंग के अंतर्गत उनके न्यायालय को इस तरह के अधिकार नहीं है और सक्षम सहकारी न्यायालय अथवा अधिकरण इस मामले में विधिवत कार्रवाई करे।
इसका फायदा आने वाले दिनों में इस संस्था के अलावा उन तमाम 186 गृह निर्माण संस्थाओं को भी मिल जाता, जिनकी जमीनें तत्कालीन कलेक्टर के 04.11.2022 के आदेश के तहत जहां शहरी सीलिंग से छूट के दुरुपयोग में फंस गई, वहीं सरकारी घोषित होने की प्रक्रिया के चलते अभी तक किसी एक भी संस्था को इस आदेश के बाद प्रशासन से एनओसी नहीं मिल सकी है, लेकिन अधीनस्थ अधिकारी द्वारा खेले गये इस खेल के कारण कलेक्टर से त्रुटिवश 3 फरवरी को जो आदेश जारी हो गया, उससे अरबों रुपए मूल्य की हजारों एकड़ जमीनों की मुक्ति की राह आसान हो जाती और आने वाले दिनों में इंदौर के इतिहास का यह सबसे बड़ा महा भू-घोटाला भी साबित होता। मगर जैसे ही अग्रिबाण के हाथ कलेक्टर का यह विवादित आदेश आया और इससे जुड़े तथ्यों से उन्हें अवगत कराया गया.
कलेक्टर ने तुरंत गंभीरता से इस मामले की जांच शुरू की और 04.11.2022 के आदेश को संज्ञान में लेते हुए इस महाघोटाले की रोकथाम के लिए छुट्टी के दिन दफ्तर खुलवाकर 18 घंटे तक तमाम दस्तावेजों को खंगालने के बाद संशोधित आदेश जारी किया। इस आदेश में कलेक्टर ने आदर्श श्रमिक गृह निर्माण की खजराना स्थित 2.529 हेक्टेयर जमीन को शहरी सीलिंग की धारा 20 के अंतर्गत शासन में वैस्थित करने के लिए शासन को पृथक से पत्र जारी करने की बात भी कही और उक्त जमीन पर नगर भूमि यानी शहरी सीलिंग अधिनियम 1976 की धारा 19 और 20 के प्रावधानों के तहत दी गई विमुक्ति में संलग्र शर्तों का अपालन और उल्लंघन होना सिद्ध बताया। 72 घंटे में ही कलेक्टर ने अपने आदेश को दुरुस्त करते हुए भू माफिया के मंसूबे न सिर्फ ध्वस्त कर डाले, बल्कि ये संदेश भी दे दिया कि प्रशासन गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनों की लूट नहीं होने देगा।
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