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अग्निपथ भर्ती में बड़ा बदलाव: नेपाली गोरखाओं की एंट्री बंद, केवल भारतीय गोरखा ही पात्र

March 21, 2026

नई दिल्ली। केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना के तहत सेना भर्ती प्रक्रिया (Army recruitment process) में बड़ा बदलाव सामने आया है। हालिया भर्ती अधिसूचनाओं से संकेत मिल रहे हैं कि अब नेपाली गोरखाओं (Nepalese Gurkhas) की भर्ती का रास्ता बंद कर दिया गया है।

हालांकि इस संबंध में सेना की ओर से कोई अलग आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जून से शुरू होने वाली भर्ती के लिए जारी नोटिफिकेशन में ‘गोरखा’ की जगह केवल ‘भारतीय गोरखा’ का उल्लेख किया गया है। इससे स्पष्ट है कि अब सिर्फ भारत में रहने वाले गोरखा युवा ही आवेदन कर सकेंगे।

नेपाल के रुख का असर

इस बदलाव के पीछे नेपाल का पहले से चला आ रहा विरोध अहम माना जा रहा है। जब अग्निपथ योजना लागू की गई थी, तब नेपाल ने इसे भारत, ब्रिटेन और नेपाल के बीच हुए पुराने त्रिपक्षीय समझौते के खिलाफ बताया था।



  • नेपाल के विरोध के बाद वहां स्थित भारतीय सेना के दो भर्ती केंद्र भी बंद हो गए थे, जहां से लंबे समय से गोरखा सैनिकों की भर्ती होती थी। भारत ने कई बार बातचीत के जरिए स्थिति सुलझाने की कोशिश की, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी।

    सुरक्षा और अवसर भी वजह

    सूत्रों के अनुसार, नेपाल में बढ़ते भारत-विरोधी माहौल और बदलते सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। इसके अलावा नेपाली गोरखाओं के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निजी सुरक्षा एजेंसियों और विदेशी सेनाओं में काम करने के बेहतर अवसर भी मौजूद हैं।

    बताया जाता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी कई गोरखा सैनिकों को रूसी सेना में काम करने के मौके मिले। वहीं, ब्रिटेन की सेना में गोरखाओं की भर्ती पहले से जारी है।

    भारतीय सेना में पहले से बड़ी मौजूदगी

    फिलहाल भारतीय सेना की गोरखा राइफल्स में करीब 30 हजार से अधिक नेपाली गोरखा सैनिक सेवा दे रहे हैं। इसके अलावा नेपाल में बड़ी संख्या में पूर्व गोरखा सैनिक भी हैं, जिन्हें भारत सरकार हर साल लगभग 500–600 करोड़ रुपये पेंशन के रूप में देती है।

    भारतीय गोरखा युवाओं को फायदा

    इस फैसले से भारत में रह रहे गोरखा युवाओं के लिए सेना में भर्ती के अवसर बढ़ने की संभावना है। अब वे सीमित प्रतिस्पर्धा के बीच ज्यादा मौके हासिल कर सकेंगे। कुल मिलाकर, अग्निपथ योजना के तहत यह बदलाव भारत-नेपाल सैन्य सहयोग के लंबे इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।

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