
श्रीनगर। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) में झीलों (Lakes) के तेजी से घटते अस्तित्व को लेकर चिंताजनक स्थिति उजागर की है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1967 में मौजूद 697 झीलों में से करीब 45 प्रतिशत यानी 315 झीलें पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं, जबकि 29 प्रतिशत यानी 203 झीलों का आकार काफी सिकुड़ गया है।
2017-18 से 2021-22 के बीच किए गए इस ऑडिट में पाया गया कि कुल 518 झीलों के क्षेत्रफल में 2,851.26 हेक्टेयर की भारी कमी आई है। इसमें 1,537.07 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली 315 झीलें पूरी तरह खत्म हो गईं, जबकि 203 झीलों के क्षेत्रफल में 1,314.19 हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि कुछ सकारात्मक आंकड़े भी सामने आए हैं, जहां 150 झीलों के क्षेत्रफल में 538.22 हेक्टेयर की वृद्धि हुई और 29 झीलों में कोई बदलाव नहीं देखा गया। बावजूद इसके, झीलों के कुल दायरे में आई कमी पर्यावरण, जैव विविधता और जल संसाधनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत दे रही है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जिन 203 झीलों का क्षेत्रफल घटा है, उनमें से 63 झीलें ऐसी हैं जिनका जल क्षेत्र 50 प्रतिशत या उससे अधिक कम हो चुका है। इससे इनके पूरी तरह विलुप्त होने का खतरा और बढ़ गया है।
संरक्षण में बड़ी कमी उजागर
ऑडिट रिपोर्ट में संरक्षण तंत्र की खामियों को भी रेखांकित किया गया है। सरकार ने केवल छह प्रमुख झीलों—डल झील, वुलर झील, होकरसर झील, मानसबल झील, सुरिनसर झील और मानसर झील—के लिए ही संरक्षण और प्रबंधन योजनाएं तैयार कीं।
इसके विपरीत, बाकी 691 झीलों के लिए न तो कोई ठोस योजना बनाई गई और न ही पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की योजनाओं के तहत सहायता लेने की पहल की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच कुल कैपेक्स बजट का लगभग 1 प्रतिशत, यानी 560.65 करोड़ रुपये, सिर्फ इन छह झीलों के संरक्षण पर खर्च किया गया, जिससे बाकी झीलों की अनदेखी साफ तौर पर सामने आती है।
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