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ईरान संकट का असर: केले के दाम धराशायी, 2 रुपये किलो तक पहुंचे, महाराष्ट्र के किसान संकट में

April 17, 2026

मुंबई। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारत के कृषि व्यापार (agricultural business) पर भी साफ दिखने लगा है। खासतौर पर ईरान से जुड़े हालात और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते संकट ने महाराष्ट्र के केला उत्पादक किसानों (banana growing farmers) की कमर तोड़ दी है। निर्यात ठप होने से बाजार में सप्लाई बढ़ गई है और कीमतें गिरकर बेहद निचले स्तर पर पहुंच गई हैं।

निर्यात रुका, घरेलू बाजार में बढ़ा दबाव

महाराष्ट्र के प्रमुख केला उत्पादक जिले जलगांव और सोलापुर इस समय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बेहतर मौसम और अच्छी बारिश के कारण इस बार उत्पादन अच्छा हुआ था, लेकिन खाड़ी देशों में जारी संकट के चलते निर्यात लगभग ठप पड़ गया। कोल्ड स्टोरेज में बड़ी मात्रा में केले फंसे हुए हैं और शिपमेंट रुकने से किसानों को मजबूरन माल घरेलू बाजार में उतारना पड़ रहा है।

कीमतों में भारी गिरावट

फरवरी तक केले के दाम 18 से 22 रुपये प्रति किलो के बीच थे, लेकिन हालात तेजी से बिगड़े।

मार्च में कीमतें घटकर 8–10 रुपये प्रति किलो रह गईं
अप्रैल के पहले हफ्ते में ये गिरकर सिर्फ 2–3 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गईं

कीमतों में यह गिरावट तब और तेज हुई जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव बढ़ा और आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई।



  • किसानों को भारी नुकसान

    सोलापुर जिले के करमाला क्षेत्र के एक किसान के मुताबिक, उन्होंने 10 एकड़ में केले की खेती पर करीब 20 लाख रुपये का निवेश किया था। फरवरी में जहां उन्हें 22 रुपये प्रति किलो तक भाव मिला, वहीं अब कीमतें 2–3 रुपये पर आ गई हैं।
    ऐसे में उन्हें कुल मिलाकर सिर्फ 2.5 से 3 लाख रुपये मिलने की उम्मीद है, यानी 17 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान झेलना पड़ सकता है।

    सालभर की फसल, जोखिम भी बड़ा

    केले की खेती अन्य फसलों की तरह मौसमी नहीं होती, बल्कि इसमें सालभर निवेश करना पड़ता है। ऐसे में कीमतों में अचानक गिरावट किसानों के लिए भारी संकट खड़ा कर देती है। लागत निकलना भी मुश्किल हो जाता है।

    सरकार से मदद की मांग

    निर्यात पर निर्भर किसान अब सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि

    मुआवजा दिया जाए
    नए निर्यात बाजार तलाशे जाएं
    खाड़ी देशों के विकल्प विकसित किए जाएं

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही निर्यात के रास्ते नहीं खुले, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है।

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