
नई दिल्ली। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) की कानूनी मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। कथित शराब घोटाले (Liquor Scams) से जुड़े मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत द्वारा रिक्यूजल याचिका खारिज किए जाने के बाद, अदालत की कार्यवाही से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर होने को लेकर अब कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट (Contempt of Court) का विवाद खड़ा हो गया है।
इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए अरविंद केजरीवाल के साथ-साथ कई अन्य नेताओं और व्यक्तियों को नोटिस जारी किया है। इनमें मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, दिग्विजय सिंह और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का नाम शामिल है। अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को संबंधित वीडियो हटाने का भी निर्देश दिया है।
कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट क्या है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत के आदेश की जानबूझकर अवहेलना करना या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट यानी अदालत की अवमानना कहलाता है। यह प्रावधान Contempt of Courts Act, 1971 के तहत नियंत्रित होता है। इसके अलावा हाई कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 215 और सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 129 के तहत अवमानना पर कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है।
अवमानना मुख्यतः दो प्रकार की होती है-
सिविल कंटेम्प्ट: जब अदालत के आदेश का पालन नहीं किया जाता
क्रिमिनल कंटेम्प्ट: जब अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाए या कार्यवाही में बाधा डाली जाए
सजा कितनी हो सकती है?
कानूनी प्रावधानों के अनुसार, कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट साबित होने पर अधिकतम 6 महीने की सजा या जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि कई मामलों में अदालत माफी स्वीकार कर लेती है और सजा नहीं देती। अंतिम निर्णय अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि वह माफी से संतुष्ट होती है या नहीं।
मामला क्यों उठा?
आरोप है कि अरविंद केजरीवाल ने कथित शराब घोटाले से जुड़े मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ रिक्यूजल याचिका पर खुद पैरवी की थी। 13 अप्रैल को हुई सुनवाई का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर साझा किया गया, जिसे कई लोगों ने प्रसारित भी किया।
इसी आधार पर अधिवक्ता वैभव सिंह ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह अदालत की अवमानना के दायरे में आता है। याचिका में संबंधित वीडियो हटाने और कार्रवाई की मांग की गई है। अब सभी संबंधित पक्षों से अदालत ने जवाब मांगा है और मामला आगे की सुनवाई में तय होगा कि यह अवमानना की श्रेणी में आता है या नहीं।
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