
नई दिल्ली। ज्येष्ठ माह (Jyeshtha Month) को हिंदू पंचांग में अत्यंत विशेष माना जाता है, क्योंकि इस समय सूर्य (Sun) अपनी तीव्र ऊर्जा के साथ आकाश में विद्यमान रहते हैं। माना जाता है कि इस अवधि में की गई सूर्य उपासना (Sun Worship) व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव (Positive Change) लाती है और शारीरिक तथा मानसिक शक्ति को बढ़ाती है। इसी कारण ज्येष्ठ माह के प्रत्येक रविवार (Sunday) को सूर्यदेव की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है।
इस परंपरा के अनुसार, रविवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ और हल्के रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। इसके बाद सूर्योदय के समय सूर्यदेव को अर्घ्य देने की विधि अपनाई जाती है। तांबे के पात्र में जल लेकर उसमें पुष्प, चंदन और अक्षत मिलाकर सूर्य की ओर अर्पित किया जाता है। ऐसा करते समय मन को शांत और एकाग्र रखना आवश्यक माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य को अर्घ्य देते समय मंत्रों का जाप करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। इस क्रिया को आत्मबल बढ़ाने, रोगों से मुक्ति और जीवन में स्थिरता लाने वाला बताया गया है। ऐसा भी विश्वास है कि नियमित सूर्य उपासना से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और व्यक्ति दीर्घायु प्राप्त करता है।
ज्येष्ठ माह के रविवार को व्रत रखने की भी परंपरा बताई गई है। इस दिन साधक हल्का भोजन या फलाहार ग्रहण करते हैं और नमक से परहेज करते हैं। यह व्रत शरीर को शुद्ध रखने और मानसिक अनुशासन बढ़ाने का प्रतीक माना जाता है। अगले दिन व्रत का समापन करने की परंपरा भी प्रचलित है।
इसके अलावा इस माह में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री देने से शुभ फल प्राप्त होने की मान्यता है। साथ ही पशु-पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करना और सूर्य के सामने ध्यान करना भी इस अवधि में महत्वपूर्ण माना जाता है।
समग्र रूप से ज्येष्ठ माह की सूर्य उपासना को एक ऐसी परंपरा के रूप में देखा जाता है, जो व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ती है और जीवन में संतुलन, ऊर्जा और सकारात्मकता बनाए रखने का संदेश देती है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved